हजारीबाग में ‘डीजल डिप्लोमेसी’ पर भड़का आक्रोश: कोयला ढोने वाले हाइवा के लिए अथाह तेल, पर तड़पते मासूमों के अस्पताल के लिए एक बूंद भी नहीं?

Hazaribagh : हजारीबाग के शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मंगलवार की रात जो कुछ भी हुआ, उसने प्रशासन की प्राथमिकताओं का...

Hazaribagh : हजारीबाग के शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मंगलवार की रात जो कुछ भी हुआ, उसने प्रशासन की प्राथमिकताओं का ऐसा क्रूर चेहरा सामने लाया है जिसने पूरे झारखंड को हिला कर रख दिया है. एक तरफ अस्पताल का अति संवेदनशील नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई वार्ड और पूरा मेडिकल कॉलेज अंधेरे में डूबा था, ऑक्सीजन की पाइपलाइन फटने से वेंटिलेटर पर मासूम नवजात सांसों के लिए तड़प रहे थे, और जब अस्पताल के जिम्मेदार अधीक्षक से जनरेटर न चलने का कारण पूछा गया, तो उनका बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब था कि उन्हें इमरजेंसी के लिए डीजल ही नहीं मिल रहा है. अब हज़ारीबाग की जनता प्रशासन के मुंह पर एक सीधा और कड़वा सवाल दाग रही है. सवाल यह है कि अगर ज़िले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल को जीवन रक्षक आपातकालीन सेवाओं के लिए चंद लीटर डीजल नसीब नहीं हो रहा, तो फिर बड़कागांव से लेकर कोयलांचल की सड़कों पर चौबीसों घंटे दौड़ने वाले भारी-भरकम हाइवा और ट्रकों के लिए लाखों लीटर डीजल कहाँ से आ रहा है? क्या हज़ारीबाग की जनता और मासूम बच्चों की जान की कीमत इन कंपनियों के कोयले से भी कम है?

बड़कागांव की खदानों से एनटीपीसी, त्रिवेणी और बीजीआर का साम्राज्य: कंपनियों के लिए तेल की नदियां, जनता के लिए सूखा

अगर ज़िले के कोयला ट्रांसपोर्टिंग नेटवर्क का पूरा विश्लेषण करें, तो आंखें फटी की फटी रह जाएंगी, बड़कागांव प्रखंड में कोयला खनन के पूरे साम्राज्य का मुख्य केंद्र सरकारी क्षेत्र की महारत्न कंपनी एनटीपीसी (नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन) ही है. एनटीपीसी के पास यहां के दो सबसे बड़े कोल ब्लांक, पकरी बरवाडीह कोल ब्लॉक और बादम कोल ब्लॉक की कमान है. एनटीपीसी खुद सीधे तौर पर कोयला निकालने या गाड़ियों से उसे ढोने का काम नहीं करती, बल्कि उसने इसके लिए देश की दिग्गज माइनिंग कंपनियों को ठेका दे रखा है. पकरी बरवाडीह कोल ब्लॉक में माइनिंग डेवलपमेंट एंड ऑपरेटर के रूप में त्रिवेणी सैनिक कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड सबसे बड़ा नाम है. बड़कागांव की सड़कों पर जो चौबीसों घंटे हाइवा गाड़ियों का रेला दिखाई देता है, उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी कंपनी के ट्रांसपोर्टिंग नेटवर्क का है. त्रिवेणी ग्रुप की तरह ही बीजीआर माइनिंग एंड इन्फ्रा (बीजीआर कंपनी) भी बड़कागांव के कोयलांचल में एक और बहुत बड़ी खिलाड़ी है. इस कंपनी के पास भी एनटीपीसी के माइंस में उत्खनन और भारी वाहनों के जरिए कोयला ढुलाई का बहुत बड़ा ठेका है. इसके अलावा, बादम कोल ब्लॉक में माइनिंग और ट्रांसपोर्टेशन के संचालन की जिम्मेदारी ऋत्विक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के पास है. इन बड़ी-बड़ी कंपनियों के नीचे दर्जनों छोटी आउटसोर्सिंग कंपनियां और स्थानीय ट्रांसपोर्टर्स के सिंडिकेट काम करते हैं. इन कंपनियों की एक भी गाड़ी डीजल की कमी के कारण कभी एक मिनट के लिए भी नहीं रुकती. इनके लिए पेट्रोल पंपों से लेकर प्राइवेट टैंकरों तक, डीजल की नदियां चौबीसों घंटे बह रही हैं. लेकिन जब उसी ज़िले के मुख्य अस्पताल में 300 से अधिक लाचार मरीजों और नवजात बच्चों की जिंदगी दांव पर लगती है, तो पूरा प्रशासनिक अमला और अस्पताल प्रबंधन ‘डीजल नहीं मिलने’ का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है. नियम और कानून साफ कहते हैं कि आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए डीजल की आपूर्ति को कोई भी पेट्रोल पंप संचालक या अधिकारी रोक नहीं सकता, तो फिर हजारीबाग में यह ‘डीजल का अकाल’ सिर्फ सरकारी अस्पताल के लिए ही क्यों पड़ा?

जनता पूछ रही है तीखे सवाल: कॉरपोरेट की कमाई बड़ी या हज़ारीबाग की भलाई?

अस्पताल के इस ‘डीजल संकट’ ने अब एक बड़े नीतिगत और नैतिक विरोधाभास की ओर इशारा कर दिया है. सोशल मीडिया से लेकर हजारीबाग के चौक-चौराहों पर जनता अब बिजली विभाग और अस्पताल प्रबंधन को घेरते हुए यह सवाल पूछ रही है कि जब इन बड़ी कोयला कंपनियों के हजारों हाइवा को रोजाना लाखों लीटर डीजल बिना किसी रुकावट के मिल सकता है, तो अस्पताल के सरकारी जनरेटर के लिए कुछ सौ लीटर डीजल का बैकअप क्यों नहीं रखा गया? क्या जिला प्रशासन और माइनिंग कंपनियों का पूरा ध्यान सिर्फ ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी कोयले की सुरक्षित विदाई और कंपनियों का मुनाफा बढ़ाने पर है? क्या हजारीबाग की आम जनता को बुनियादी स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं देना प्रशासन की प्राथमिकताओं की लिस्ट में सबसे नीचे है?

सिस्टम के मुंह पर तमाचा है यह विरोधाभास

एक तरफ कोयले के परिवहन से उड़ती धूल और डीजल के धुएं से हजारीबाग की सड़कें हांफ रही हैं, दूसरी तरफ उसी धुएं के बीच बसा सरकारी अस्पताल अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए हांफ रहा है. प्रबुद्ध नागरिकों और जागरूक लोगों का साफ कहना है कि अधीक्षक का यह बहाना कि ‘डीजल नहीं मिल रहा’, पूरी तरह से नाकामी और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है. यह सीधे तौर पर प्रशासनिक लकवे को दिखाता है कि जहां अरबों का कोयला ढोने के लिए तेल का अकूत भंडार है, वहां नवजातों की सांसें बचाने के लिए जनरेटर री-स्टार्ट करने का दम नहीं है. हजारीबाग की जनता अब इस ‘डीजल डिप्लोमेसी’ के पीछे के चेहरों को बेनकाब करने और इस पूरे सिस्टम की उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रही है.

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