Akshay Kumar Jha
Ranchi: बनाने को तो कागजों पर सरकार के बड़े अधिकारी और मंत्री सैकड़ों तरह की योजना बनाते हैं. लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनी योजनाएं धरातल पर उतर पाती हैं. अगर धरातल पर कुछ योजनाएं उतर भी जाती हैं तो उनमें से कितनी पूरी हो पाती हैं. जाहिर सी बात है कि सरकार की तरफ से जन सरोकार के लिए योजनाओं की तैयारी की जाती है. खास कर गरीबों के लिए. गरीबों के बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं. वहां उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ शौचालय और पेयजल की व्यवस्था भी दी जाती है.

बात हो रही है सरकारी स्कूलों में पेयजल से जुड़ी व्यवस्था की. पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की तरफ से एक योजना बनायी गयी. योजना यह थी कि विभाग की तरफ से सभी स्कूलों में लगे चापानलों या पानी की जो भी व्यवस्था है उससे आ रहे पेयजल की गुणवत्ता की जांच होगी. जांच यह करना था कि पानी में कितना मिनिरल्स कितनी मात्रा में है. पानी पीने योग्य है भी या नहीं. लेकिन विभाग की सुस्त चाल ऐसी है कि आंकड़े देखकर आप हैरत में पड़ जाएंगे.
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सिर्फ चार प्रतिशत ही काम कर पाया विभाग
झारखंड में सरकारी स्कूलों की संख्या विभाग के मुताबिक 40,456 है. इन सभी स्कूलों में हर महीने पानी की गुणवत्ता की जांच की जानी थी. यानी एक साल में 4,86,152 बार पानी का जांच किया जाना है. यानी हर तीन महीने पर काम का लेखा-जोखा लिया जाना था. पहले तीन महीने में 1,21,548 बार पानी का जांच हो जाना था. लेकिन पहले तिमाही में विभाग की तरफ से सिर्फ 4,962 बार ही पानी का जांच किया जा सका. ऐसा विभाग की समीक्षा रिपोर्ट में सामने आया है.
करोड़ों का खर्च, क्या विभाग के कर्मियों पर होगी कार्रवाई
इस काम के लिए सरकार के खजाने से करोड़ों रुपए खर्च होते हैं. प्राइवेट एजेंसियों को भी हायर किया जाता है. लेकिन विभाग के कर्मियों की लापरवाही की वजह से आज झारखंड के स्कूलों के बच्चों की जिंदगियां दांव पर है. वो स्कूल में कैसा पानी पी रहे हैं, किसी को पता ही नहीं है. अब अमीर परिवार से आने वालों बच्चों की तरह वो महंगे वाटरबोतल तो साथ में नहीं ले जा सकते हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग की तरफ से जिम्मेदार कर्मियों पर सरकार का चाबुक चलेगा या इस मामले पर भी लिपापोती हो जाएगी.
