झारखंड का भाषाई महासंग्राम: 7 मंत्रियों की माथापच्ची, नहीं बनी सहमति, अब सीएम सोरेन के अंतिम क्लाइमेक्स पर टिकी निगाहें

Ranchi: झारखंड में शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) के बहाने शुरू हुआ भाषाई विवाद सुलझने के बजाय और अधिक गहरा गया है. राज्य...

Ranchi: झारखंड में शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) के बहाने शुरू हुआ भाषाई विवाद सुलझने के बजाय और अधिक गहरा गया है. राज्य के सीमावर्ती जिलों के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर बुधवार को प्रोजेक्ट भवन में हुई सात कैबिनेट मंत्रियों की हाई-प्रोफाइल बैठक पूरी तरह बेनतीजा रही. इस पर सहमति नहीं बन पाई. कमेटी का विस्तार कर झामुमो की शिल्पी नेहा तिर्की और हफीजुल हसन को शामिल तो किया गया, लेकिन वे भी इस साझा पत्र से दूरी बनाते दिखे. साफ है कि कांग्रेस और राजद जहां जमीनी हकीकत का हवाला देकर भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करने के लिए अड़े हैं, वहीं झामुमो फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. अब इस भाषाई त्रिकोण का अंतिम फैसला पूरी तरह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पाले में चला गया है.

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क्या कहा वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने?

वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि बैठक अच्छे माहौल में हुई है. सबने अपनी बात रखी है. भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वाले लोग भी झारखंड में हैं. कमेटी अपनी रिपोर्ट सीएम को सौंपेगी. सीएम को इस पर अंतिम निर्णय लेना है.

पिछली बैठकों का पेंच

यह पहली बार नहीं है जब यह कमेटी उलझी है. इससे पहले हुई पांच मंत्रियों की बैठक में भी गतिरोध जस का तस बना रहा. दरअसल, विवाद की मुख्य जड़ वर्तमान व्यवस्था का ‘पार्ट- टू नियम है, जिसके तहत अभ्यर्थियों के लिए 15 जनजातीय भाषाओं में से किसी एक को चुनना अनिवार्य किया गया है.

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मंत्रियों और क्षेत्रीय नेताओं का तर्क

• भौगोलिक हकीकत: गढ़वा, पलामू और चतरा जैसे जिलों में नागपुरी या अन्य अधिसूचित जनजातीय भाषाएं बोलने वाले न के बराबर हैं.
• बड़ा नुकसान: इस कड़े नियम से इन सीमावर्ती जिलों के लाखों स्थानीय अभ्यर्थी बिना किसी गलती के रेस से बाहर हो जाएंगे.
• ऐतिहासिक आधार: वर्ष 2012 और 2019 की अधिसूचनाओं में इन भाषाओं को जगह मिली थी. मैथिली तो राज्य की दूसरी राजभाषा है.

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