Palamu: जब दुनिया में ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ और ‘क्लाइमेट चेंज’ जैसे शब्द आम नहीं हुए थे, तब पलामू की माटी से एक युवा ने प्रकृति को अपना धर्म मानकर एक मौन क्रांति की शुरुआत की थी. वर्ष 1966 के उस भयानक अकाल ने युवा मन पर ऐसा घाव दिया कि उन्होंने अपना पूरा जीवन जंगलों को सहेजने और वृक्षों को बचाने में झोंक दिया. वह युवा कोई और नहीं, बल्कि आज देश-विदेश में प्रख्यात पर्यावरणविद डॉ. कौशल किशोर जायसवाल हैं. उनके ऐतिहासिक “वनराखी मूवमेंट” ने इस वर्ष अपने गौरवशाली 50 वर्ष (स्वर्ण जयंती) पूरे कर लिए हैं. आज विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस आंदोलन की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही है. पर्यावरण संरक्षण को एक जन-आंदोलन का रूप देने वाले डॉ. कौशल का यह अभियान आज सात समंदर पार तक अपनी पहचान बना चुका है.

अकाल की वो त्रासदी, जिसने बदला जीवन का रास्ता
डॉ. कौशल किशोर जायसवाल बताते हैं कि 1966 के भीषण सूखे ने उन्हें प्रकृति और इंसान के अटूट रिश्ते का अहसास कराया. उन्हें समझ आ गया कि जल और जंगल के बिना मानव सभ्यता का कोई भविष्य नहीं है. इसी सोच ने “पर्यावरण धर्म” और “वनराखी मूवमेंट” की नींव रखी. उनका एक बेहद लोकप्रिय और मार्मिक संदेश है: “ऊपर सूर्य देव हैं और नीचे वृक्ष देव. अगर ये दोनों न रहें, तो इस धरती पर जीवन की कल्पना भी नामुमकिन है.”
5 दशक का सफर: 59 लाख पौधे और 26 लाख ‘वृक्ष भाई’
पिछले लगभग छह दशकों के अपने अथक सफर में डॉ. कौशल ने भारत के 26 राज्यों के 181 जिलों का दौरा किया है. इतना ही नहीं, उनका यह हरित संदेश नेपाल, भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, अज़रबैजान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और वियतनाम जैसे देशों तक भी गूंजा है. मुफ्त वितरण व रोपण: उनके इस अभियान के तहत अब तक लगभग 59 लाख पौधों का निःशुल्क वितरण और रोपण किया जा चुका है. रक्षासूत्र बंधन: 26 लाख से अधिक पेड़ों को बकायदा रक्षासूत्र (राखी) बांधकर उन्हें समाज के संरक्षण का हिस्सा बनाया गया है. डॉ. कौशल के लिए पेड़ सिर्फ वनस्पति नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य हैं.
बंजर भूमि पर लहराया ‘डाली का जंगल’
पलामू जिले के छतरपुर अनुमंडल का डाली ग्राम पंचायत आज डॉ. कौशल की आधी सदी की तपस्या का जीता-जागता सबूत है. जो जमीन कभी पथरीली और बंजर हुआ करती थी, आज वहां हरियाली की घनी चादर है. यहां स्थित ‘मोहनलाल खुर्जा-पार्वती देवी पार्क’ में 22 देशों की 200 से अधिक दुर्लभ और औषधीय प्रजातियों के पौधे मौजूद हैं, जो आज शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए एक खुला विश्वविद्यालय बन चुका है.
डाली में बना दुनिया का पहला “वृक्ष देव मंदिर”
डॉ. कौशल की सोच सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रही, उन्होंने प्रकृति को अध्यात्म और संस्कृति से जोड़ा. इसी कड़ी में इसी वर्ष 12 फरवरी 2026 को डाली गांव में दुनिया के पहले “पर्यावरण धर्म ज्ञान वृक्ष देव मंदिर” की स्थापना की गई. अनोखी विशेषता: इस मंदिर में कोई ईंट-पत्थर या मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां जीवित वृक्षों को ही साक्षात देवता मानकर पूजा जाता है. वैश्विक उपस्थिति इसके उद्घाटन के मौके पर अमेरिका के प्रसिद्ध शोधकर्ता जॉर्ज जेम्स, कर्नाटक के प्रख्यात पर्यावरणविद और ‘आपीको आंदोलन’ के प्रणेता पांडुरंग हेगड़े सहित दुनिया भर के विशेषज्ञ गवाह बने थे.
लोग ‘पागल’ कहते रहे, पर कारवां बढ़ता गया
शुरुआती दौर बेहद चुनौतीपूर्ण था. जब डॉ. कौशल अपनी गाड़ी में पौधे लादकर गांव-गांव घूमते थे, तो लोग हंसते थे, मजाक उड़ाते थे और उन्हें ‘पागल’ तक कह देते थे. लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. कोरोना काल में जब ऑक्सीजन की किल्लत से हाहाकार मचा, तब दुनिया को समझ आया कि पलामू का यह पर्यावरण योद्धा दशकों से किस ‘ऑक्सीजन बैंक’ की बात कर रहा था.
किसानों के लिए ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ है पेड़ खेती
डॉ. कौशल ने दशकों पहले देश के अन्नदाताओं को “वृक्ष खेती” का मंत्र दिया था. उनका कहना है कि पेड़ किसानों के लिए एक सुरक्षित ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ की तरह हैं. सूखा हो या बाढ़, पेड़ हमेशा किसान की आर्थिक रीढ़ बनकर खड़े रहते हैं. उनका साफ मानना है कि वनों को काटना या नुकसान पहुंचाना प्रकृति के खिलाफ एक अक्षम्य अपराध है.
स्कूली किताबों से लेकर इंटरनेशनल अवॉर्ड्स तक
आज डॉ. कौशल किशोर जायसवाल की जीवनी सीबीएसई (CBSE) बोर्ड की आठवीं और आईसीएसई (ICSE) बोर्ड की छठी कक्षा के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है. झारखंड के कई शिक्षण संस्थानों में उनके कार्यों पर रिसर्च हो रही है. देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं और ज्ञान प्रतियोगिताओं में उनके इस आंदोलन से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं. उन्हें अब तक 10 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों समेत लगभग 80 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं.
एक अकेले का संकल्प, जो बन गया महा-आंदोलन
’वनराखी आंदोलन’ की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह किसी सरकारी फंड या बड़ी संस्था के भरोसे नहीं, बल्कि एक अकेले व्यक्ति के अडिग संकल्प से शुरू हुआ और आज एक विशाल जन-आंदोलन बन चुका है. जलवायु परिवर्तन और जल संकट के इस दौर में डॉ. कौशल किशोर जायसवाल की यह जीवन यात्रा पूरी दुनिया को रास्ता दिखाती है कि अगर इरादा पक्का हो, तो एक अकेला इंसान भी धरती की तकदीर और तस्वीर बदल सकता है.
