मनीष भारद्वाज

- 34 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्रों में पानी की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल, जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही उजागर.
- कुल लक्ष्य का मात्र 1.15 प्रतिशत जांच किया गया.
- क्या विभाग जिम्मेदारी लेगा इन गरीब मासूम बच्चों के सेहत का?
रांची : झारखंड में आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले लाखों गरीब बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं की सेहत को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. सरकार एक तरफ सुरक्षित पेयजल और कुपोषण मुक्त झारखंड के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ आंगनबाड़ी केंद्रों में इस्तेमाल हो रहे पानी की जांच का काम लगभग ठप पड़ा हुआ है. हालत इतनी खराब है कि वर्ष 2026-27 में 4,10,328 जल गुणवत्ता परीक्षण का लक्ष्य तय किया गया, लेकिन अप्रैल और मई बीत जाने के बाद भी सिर्फ 4,723 जांचें ही हो सकी हैं. यानी कुल लक्ष्य का मात्र 1.15 प्रतिशत ही जांच हुआ है.
यह आंकड़ा सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उन लाखों गरीब बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़ की कहानी है, जो रोज आंगनबाड़ी केंद्रों में पानी पीते हैं और जिनके पास सुरक्षित विकल्प भी नहीं है.
फाइलों में दौड़ रहा मिशन, जमीन पर दम तोड़ रही व्यवस्था
जल जीवन मिशन और पेयजल विभाग की बैठकों में सुरक्षित पानी की बातें होती हैं, प्रेजेंटेशन दिए जाते हैं, लक्ष्य तय किए जाते हैं और उपलब्धियों के दावे किए जाते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचने वाला पानी सुरक्षित है या नहीं, इसकी जांच करने में विभाग पूरी तरह फिसड्डी साबित हो रहा है.
पहली तिमाही में ही 1,02,582 जल परीक्षण का लक्ष्य था, लेकिन दो महीने बाद भी महज 4,723 जांचें हुईं. इसका मतलब साफ है कि जिम्मेदार अधिकारी या तो इस गंभीर विषय को लेकर संवेदनशील नहीं हैं या फिर पूरा सिस्टम सिर्फ खानापूर्ति में लगा हुआ है.
गरीब बच्चों की जिंदगी की कीमत क्या सिर्फ एक रिपोर्ट है?
आंगनबाड़ी केंद्रों में आने वाले अधिकांश बच्चे गरीब और ग्रामीण परिवारों से होते हैं. इन्हीं केंद्रों में उन्हें पोषण आहार, शिक्षा और पेयजल उपलब्ध कराया जाता है. अगर पानी दूषित हुआ तो सबसे पहले यही मासूम बच्चे डायरिया, हैजा, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों की चपेट में आएंगे.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर विभाग समय पर पानी की जांच ही नहीं करेगा तो यह कैसे पता चलेगा कि बच्चों को दिया जा रहा पानी पीने लायक है या नहीं?
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सेविकाएं परेशान, अधिकारी बेपरवाह
ग्रामीण क्षेत्रों की कई आंगनबाड़ी सेविकाएं सीमित संसाधनों में बच्चों की देखभाल कर रही हैं. लेकिन पानी की गुणवत्ता जांच उनके हाथ में नहीं है. वे रोज बच्चों को वही पानी देने को मजबूर हैं जिसकी शुद्धता की कोई गारंटी नहीं है.
दूसरी ओर विभागीय अधिकारी समीक्षा बैठकों और कागजी प्रगति रिपोर्टों में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर जिस गंभीरता की जरूरत थी, वह कहीं नजर नहीं आ रही.
कुछ जिलों का प्रदर्शन शर्मनाक
आंकड़े बताते हैं कि सिमडेगा में 11,700 जांचों के लक्ष्य के मुकाबले केवल 10 जांचें हुईं. उपलब्धि सिर्फ 0.09 प्रतिशत रही। चतरा, जामताड़ा और पाकुड़ जैसे जिलों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है.
राजधानी रांची भी इस मामले में पिछड़ी हुई है. यहां 24,408 जांचों के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 200 परीक्षण हुए हैं. यानी राजधानी तक में बच्चों के पीने के पानी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाई है.
जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब लक्ष्य पहले से तय था, बजट उपलब्ध है, प्रयोगशालाएं हैं और जल जीवन मिशन जैसी बड़ी योजना चल रही है, तो फिर जांच का काम क्यों नहीं हुआ? आखिर किसकी जवाबदेही तय होगी?
क्या विभाग किसी बड़ी बीमारी या हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या किसी बच्चे की तबीयत बिगड़ने के बाद ही सिस्टम जागेगा?
