हजारीबाग का ऐतिहासिक पदमा किला: शाही वैभव से खंडहर तक का सफर

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Newsdesk: झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित पदमा किला, राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है इसे पदमा पैलेस के नाम से भी जाना जाता है. कभी रामगढ़ राज की शान और शक्ति का केंद्र रहा यह किला आज उपेक्षा और समय की मार झेलते हुए अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. अपनी भव्य वास्तुकला, ऐतिहासिक महत्व और गौरवशाली अतीत के बावजूद यह धरोहर धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही है. हजारीबाग से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पदमा किला रामगढ़ राजा राम नारायण सिंह के वंशजों का ऐतिहासिक किला है. यहां पर्यटक दूर-दूर से घूमने के लिए पहुंचते हैं. लेकिन, कभी राजवाड़े के ठाठ और रौनक से लैस ये किला आज खंडहर में तब्दील होते जा रहा है.

रामगढ़ राज की गौरवगाथा से जुड़ा है किला

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पदमा किला रामगढ़ राजवंश के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है. यह केवल शासकों का निवास स्थान नहीं था, बल्कि क्षेत्र की प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र हुआ करता था. उस दौर में यहां से राजकीय फैसले लिए जाते थे और आसपास के क्षेत्रों का संचालन किया जाता था. किला रामगढ़ राज की समृद्धि, प्रभाव और स्थापत्य कला का प्रतीक माना जाता था.

स्थापत्य कला का अनूठा नमूना

किले की विशाल संरचना, ऊंचे परकोटे, भव्य प्रवेश द्वार और पारंपरिक निर्माण शैली आज भी लोगों को आकर्षित करती है. किले का प्रसिद्ध शिवगढ़ द्वार इसकी ऐतिहासिक पहचान माना जाता है. पत्थरों से निर्मित यह संरचना उस समय की उन्नत वास्तुकला और निर्माण कौशल को दर्शाती है. किले के विभिन्न हिस्सों में आज भी शाही वैभव की झलक देखी जा सकती है.

ब्रिटिश काल में भी रहा महत्वपूर्ण

इतिहासकारों के मुताबिक पदमा किले का महत्व केवल स्थानीय शासन तक सीमित नहीं था. ब्रिटिश काल में भी यह क्षेत्र राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था. किले और इसके आसपास का इलाका लंबे समय तक क्षेत्रीय गतिविधियों का केंद्र बना रहा.

इंपोर्टेड गाड़ियों का रहता था काफिला

रामगढ़ राज की स्थापना बाघदेव सिंह ने 14वीं शताब्दी में की थी. इसकी पहली राजधानी उर्दा थी, जिसके बाद राजधानी को 1642 में बादाम ले जाया गया. फिर 1670 में रामगढ़, 1772 में इचाक और 1873 में इसकी राजधानी इचाक से बदलकर पदमा कर दी गई थी. उसी समय इस किले को तैयार किया गया था. स्थानीय लोग बताते हैं कि इस किले को तैयार करने में 30 साल का समय लगा था. 1873 से लेकर 1970 तक इस किले में ठाठ देखने लायक थी. महल के बाहर बड़ा मैदान हुआ करता था, जहां राजा साहब की इंपोर्टेड गाड़ियों का काफिला रहता था. गेट पर हाथी आगंतुक का स्वागत करते थे. उस जमाने में महल के लिए पावर हाउस इंग्लैंड से मंगवाया गया था, जहां से पूरे महल में बिजली सप्लाई की जाती थी.
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जर्जर होती विरासत

समय के साथ रखरखाव की कमी और प्राकृतिक क्षरण के कारण किले की स्थिति लगातार खराब होती गई. कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जबकि कुछ संरचनाएं टूटने की कगार पर हैं. वर्षों से संरक्षण के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं होने के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है. स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि यदि जल्द संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में इसका बड़ा हिस्सा नष्ट हो सकता है.

पर्यटन की अपार संभावनाएं

विशेषज्ञों का मानना है कि पदमा किला झारखंड के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में शामिल होने की क्षमता रखता है. यदि यहां संरक्षण, सौंदर्यीकरण और बुनियादी पर्यटन सुविधाओं का विकास किया जाए तो यह देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है. इससे न केवल राज्य की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिलेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा.

संरक्षण की बढ़ती मांग

स्थानीय नागरिक, इतिहासकार और विरासत संरक्षण से जुड़े लोग लगातार सरकार और संबंधित विभागों से पदमा किले के संरक्षण की मांग कर रहे हैं. उनका मानना है कि यह किला केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि हजारीबाग और झारखंड के गौरवशाली इतिहास का जीवंत दस्तावेज है. इसकी रक्षा और पुनर्स्थापन आने वाली पीढ़ियों को अपनी ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है. आज पदमा किला अपनी टूटी दीवारों और जर्जर संरचनाओं के बीच भी इतिहास की अनगिनत कहानियां समेटे खड़ा है. जरूरत है इसे संरक्षित करने की, ताकि झारखंड की यह अनमोल धरोहर आने वाले वर्षों तक अपनी गौरवगाथा सुनाता रहे.

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