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IPS ने पूरे किए गौरवशाली 133 वर्ष, जानिए वर्दी, बैज और लंदन से जुड़े इसके दिलचस्प ऐतिहासिक किस्से

Ranchi : भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक, भारतीय पुलिस सेवा IPS ने सात जून को अपने गौरवशाली इतिहास...

Ranchi : भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक, भारतीय पुलिस सेवा IPS ने सात जून को अपने गौरवशाली इतिहास के 133 वर्ष पूरे कर लिए हैं. ब्रिटिश काल में सात जून 1893 को लंदन में आयोजित हुई पहली खुली प्रतियोगी परीक्षा से शुरू हुआ यह सफर आज आधुनिक भारत की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था की रीढ़ बन चुका है. आइए इस विशेष अवसर पर जानते हैं कि कैसे एक औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था से निकलकर यह सेवा आज के आधुनिक आईपीएस के रूप में स्थापित हुई.

लंदन में 7 जून 1893 को रखी गई थी नींव

भारतीय पुलिस (आईपी) के लिए पहली खुली प्रतियोगी परीक्षा जून 1893 में इंग्लैंड में आयोजित की गई थी. इस परीक्षा के माध्यम से शीर्ष 10 उम्मीदवारों को परिवीक्षाधीन सहायक पुलिस अधीक्षक (Assistant Superintendent of Police – ASP)  के रूप में नियुक्त किया गया था. इसके बाद 1894 से 1897 के बीच हर साल सात-सात उम्मीदवारों का चयन किया गया.

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7 जून की अनोखी परंपरा : लंदन में आज भी जुटते हैं अधिकारी

इस सेवा से जुड़ी एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवित है. हर वर्ष सात जून को पूर्व आईपीएस और आईपी अधिकारी लंदन में एक लंच या डिनर पर मिलते हैं. इस मुलाकात के दौरान अधिकारी अपने सहयोगियों को पंजाबी, बंगाली, तमिल या हिंदुस्तानी भाषा में संबोधित करते हैं.

पेंशन की मांग और मौसम का संयोग

स्वतंत्रता के बाद, लंदन में इन अधिकारियों ने पाउंड स्टर्लिंग में पेंशन की मांग के लिए एक एसोसिएशन बनाई थी. उन्होंने बैठक के लिए सात जून की तारीख इसलिए चुनी क्योंकि यह आसानी से याद रहती थी और जून की शुरुआत में लंदन का मौसम बेहद सुहावना होता है. अब जब मूल अधिकारी इस दुनिया में नहीं हैं, तब भी उनके बच्चे और पोते-पोतियां इस पुरानी परंपरा को जीवित रखते हुए हर साल सात जून को एकत्र होते हैं.

1861 का पुलिस अधिनियम और खाकी वर्दी का इतिहास

ब्रिटिश भारत में पुलिस के इस ढांचे को समझने के लिए हमें अगस्त 1860 में जाना होगा. तत्कालीन भारत सरकार ने चार सिविल सेवा अधिकारियों का एक पुलिस आयोग गठित किया था. जिसकी अध्यक्षता एन.डब्ल्यू. प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के पुलिस महानिरीक्षक एमएच कोर्ट ने की थी. इसी आयोग के मसौदे के आधार पर 1861 का ऐतिहासिक पुलिस अधिनियम पारित हुआ. जिसने देश भर की पुलिस को एक समान संरचना दी.

सेना की पुरानी पंरपरा का हिस्सा वर्दी और बैज

शुरुआत में पुलिस के उच्च पदों पर सेना के अधिकारियों को नियुक्त किया जाता था. सेना के अधिकारी चाहते थे कि उन्हें वही खाकी वर्दी और रैंक बैज मिलें, जिससे वे परिचित थे. यही कारण है कि आज भी पुलिस की खाकी वर्दी और कंधे के बैज सेना की उसी पुरानी परंपरा का हिस्सा हैं. वर्ष 1947 के बाद भारतीय सेना ने जैतूनी हरे रंग की वर्दी अपना ली, जबकि पाकिस्तान की सेना और भारतीय पुलिस ने खाकी को ही बनाएं रखा.

पुराने किलों में शुरू हुआ था देश का पहला पुलिस ट्रेनिंग स्कूल

1880 के दशक तक सेना से पुलिस में अधिकारियों की आमद कम हो गई और ब्रिटेन के जमींदार परिवारों के छोटे बेटों को इसमें नियुक्तियां मिलने लगीं. 1893 की परीक्षा के बाद नियुक्त हुए अधिकारियों को प्रांतीय पुलिस प्रशिक्षण विद्यालयों में भेजा गया. ये स्कूल मुरादाबाद, फिल्लौर, भागलपुर, सागर और वेल्लोर जैसे ऐतिहासिक शहरों में स्थित थे. जो अक्सर पुराने किलों के भीतर चलाए जाते थे. मद्रास पहला ऐसा प्रांत था, जहां एक नियमित पुलिस प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की गई थी.

इंडियन इम्पीरियल पुलिस से आईपीएस बनने का सफर

इतिहासकार ग्रिफ़िथ के अनुसार, इंडियन इम्पीरियल पुलिस नाम कभी भी आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किया गया था. साल 1912-15 (इस्लिंगटन आयोग) इस आयोग की रिपोर्ट में पहली बारइंडियन पुलिस सर्विस शब्द का प्रयोग हुआ. साल 1919 का अधिनियम इस कानून के तहत इंग्लैंड और भारत में एक साथ परीक्षा कराने का प्रावधान हुआ. इसी वर्ष पहली बार भारतीयों को पदोन्नति के जरिए आईपी में शामिल होने का मौका मिला.
1921 में भारत की धरती पर पहली बार पुलिस सेवा के लिए प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की गई. साल 1923 (ली आयोग) इस आयोग ने कई अखिल भारतीय सेवाओं को बंद करने की सिफारिश की, लेकिन आईसीएस और आईपीएस के महत्व को देखते हुए इन्हें बनाएं रखने की वकालत की.

भारतीयों के लिए कठिन थे रास्ते : केवल 16 साल बदला रहा नाम

उत्तर प्रदेश के पहले भारतीय आईजी पुलिस  बीएन लाहिड़ी ( IP 1922) ने अपनी यादों में लिखा था कि शुरुआत में भारतीयों के लिए भर्ती खुलना एक बड़े आश्चर्य जैसा था, क्योंकि तब प्रत्येक प्रांत से केवल एक भारतीय को चुना जाता था. एनएस सक्सेना ( IP 1941) के अनुसार, परीक्षा राष्ट्रीय स्तर पर होती थी, लेकिन नियुक्तियां प्रांतीय आधार पर की जाती थीं. 1911 में बनी आईपीएस एसोसिएशन ने मांग की थी कि सेवा का नाम इम्पीरियल इंडियन पुलिस सर्विस हो, जिसे ब्रिटिश सरकार ने खारिज कर दिया था.

 

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