Giridih: जिले के डुमरी प्रखंड अंतर्गत अति नक्सल प्रभावित छछन्दो पंचायत का तिरिलटांड़ गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है. आज़ादी के करीब आठ दशक बीत जाने के बावजूद गांव के लगभग 30 परिवारों और 300 की आबादी को सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नसीब नहीं हो सकी हैं. पारसनाथ पहाड़ की तलहटी में बसे इस गांव की प्राकृतिक सुंदरता जितनी मनमोहक है, यहां के लोगों का जीवन उतना ही कठिन और संघर्षपूर्ण है. ग्रामीणों का मुख्य जीविकोपार्जन मजदूरी पर निर्भर है. अधिकांश लोग मधुबन क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जबकि कई युवा रोजगार की तलाश में पलायन करने को विवश हैं.
50 फीट गहरी तराई से सिर पर पानी ढोने को मजबूर महिलाएं
गांव में पेयजल की समस्या सबसे गंभीर बनी हुई है. ग्रामीणों को घने जंगल के बीच स्थित झरने के किनारे बने चुआं से पानी लाना पड़ता है. इसके लिए महिलाओं और युवतियों को लगभग 50 फीट गहरी ढलान उतरकर ऊबड़-खाबड़ पथरीले रास्ते से पानी भरना पड़ता है और फिर सिर पर पानी ढोकर करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर घर पहुंचना पड़ता है. ग्रामीणों के अनुसार गांव का एकमात्र चापाकल भी करीब एक वर्ष से खराब पड़ा है. इसके कारण लोगों की परेशानी और बढ़ गई है.

गंदा पानी पीने को विवश ग्रामीण
तिरिलटांड़ से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित डाड़ी का पानी ग्रामीणों की प्यास बुझाने का एकमात्र सहारा बना हुआ है. ग्रामीण इसी पानी को छानकर पीते हैं और घरेलू उपयोग में लाते हैं. लेकिन बरसात के दौरान नाले का पानी मिलने और जंगली चूहों द्वारा चारों ओर सुरंगें बना देने के कारण यह जल स्रोत भी प्रदूषित हो चुका है. इसके बावजूद ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
अधूरी सड़क बनी अभिशाप
गांव तक पहुंचने के लिए करीब पांच किलोमीटर लंबी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़क का उपयोग करना पड़ता है, लेकिन इसका निर्माण आज तक पूरा नहीं हो पाया है. चार किलोमीटर सड़क का कालीकरण प्रस्तावित था, जो अधूरा रह गया. वहीं लगभग डेढ़ किलोमीटर तक केवल मिट्टी-मोरम का पथरीला रास्ता है, जिस पर आवागमन बेहद कठिन है. ग्रामीणों को पहाड़ी और पथरीले मार्ग से होकर गांव तक पहुंचना पड़ता है. बारिश के दिनों में स्थिति और भी विकट हो जाती है.
स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का भी अभाव
गांव में न तो स्वास्थ्य केंद्र है और न ही शिक्षा की समुचित व्यवस्था. यदि रात में किसी महिला को प्रसव पीड़ा होती है तो ग्रामीण उसे खटिया पर लादकर लगभग एक किलोमीटर दूर तक ले जाते हैं, जहां से एंबुलेंस की मदद से 20 किलोमीटर दूर डुमरी या गिरिडीह अस्पताल पहुंचाया जाता है.
विकास की कमी से टूट रहे रिश्ते
ग्रामीणों का कहना है कि गांव की बदहाल स्थिति का असर सामाजिक जीवन पर भी पड़ रहा है. मांझी हड़ाम कारू मुर्मू ने बताया कि जब लोग रिश्ते की बात लेकर गांव आते हैं तो सड़क, पानी और अन्य सुविधाओं की कमी देखकर विवाह प्रस्ताव ठुकरा देते हैं. वहीं गांव के प्रतिष्ठित ग्रामीण मोहन सोरेन ने बताया कि उनका विवाह साहिबगंज में तय हुआ था. लड़की पक्ष के लोग गांव देखने आए, लेकिन यहां की बदहाल सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था देखकर उन्होंने रिश्ता करने से इनकार कर दिया.
जलमीनार बनी शोपीस, तीन साल से नहीं हुई चालू
भाजपा किसान मोर्चा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य दीपक श्रीवास्तव ने कहा कि गांव की बदहाली विकास व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है. उन्होंने बताया कि कई बार संबंधित अधिकारियों को लिखित आवेदन देकर समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि गांव में तीन स्थानों पर जलमीनार और टंकियां स्थापित की गई हैं, लेकिन करीब तीन वर्षों से उन्हें चालू नहीं किया गया है. यदि नल-जल योजना को शुरू कर दिया जाए तो ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सकता है.
वहीं नारायण महतो ने आरोप लगाया कि मिनी जलापूर्ति योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है. न तो सोलर प्लेट लगाई गई है, न मोटर और न ही घरों तक नल कनेक्शन पहुंचा है. केवल कुछ स्थानों पर पाइप बिछाकर योजना को अधूरा छोड़ दिया गया.
मुखिया ने भी उठाई सड़क निर्माण की मांग
छछन्दो पंचायत की मुखिया रूपानी देवी ने बताया कि गांव में मनरेगा के तहत मिट्टी-मोरम सड़क, तालाब और पुलिया निर्माण का कार्य कराया गया था. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत छकुडीह से सिदगढ़ा तक सड़क निर्माण के लिए सर्वे और नापी भी हुई थी, लेकिन इसके बाद कोई प्रगति नहीं हुई. उन्होंने बताया कि जहां सड़क निर्माण अधूरा है, उसके लिए पूर्व में उपायुक्त को लिखित आवेदन भी दिया जा चुका है.
ग्रामीणों की मांग
ग्रामीण चुपा हांसदा, राजेश हेम्ब्रम, दुर्गा हांसदा, कारू मुर्मू समेत अन्य लोगों ने जिला प्रशासन और सरकार से मांग की है कि,गांव तक पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए. नल-जल योजना और जलमीनार को शीघ्र चालू किया जाए. स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं.शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए. कृषि और सिंचाई के लिए चेक डैम का निर्माण कराया जाए. युवाओं के पलायन को रोकने के लिए रोजगार के अवसर विकसित किए जाएं.
ग्रामीणों का कहना है कि तिरिलटांड़ की बदहाली केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उन दूरदराज क्षेत्रों की हकीकत है जहां आज भी विकास की किरण पूरी तरह नहीं पहुंच सकी है. अब लोगों की निगाहें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं कि आखिर कब उनके गांव की तस्वीर बदलेगी.
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