Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने चार वर्षीय बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा (इंटरिम कस्टडी) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया है. अदालत ने कहा कि बाल अभिरक्षा के मामलों में माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण सर्वोपरि होता है. न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने यह फैसला मेघा सिंह की अपील पर सुनाया. महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे केवल दो महीने में एक बार 2-3 घंटे बच्ची से मिलने और वीडियो कॉल के जरिए सीमित संपर्क की अनुमति दी गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने अंतरिम अभिरक्षा की मुख्य मांग पर कोई ठोस कारण दर्ज किए बिना केवल मुलाकात (विजिटेशन राइट) का आदेश दे दिया. यह न्यायसंगत नहीं है. अदालत ने यह भी माना कि मां बिहार के सारण जिले में रहती है और उसे हर दो महीने में 400-500 किलोमीटर की यात्रा कर केवल 2-3 घंटे बच्ची से मिलने के लिए बाध्य करना अत्यंत कठोर और अव्यावहारिक है. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बच्ची, मां और पिता से स्वयं बातचीत की. अदालत ने पाया कि बच्ची मां को देखते ही उनकी गोद में चली गई और बाद में दोनों माता-पिता के प्रति समान स्नेह प्रदर्शित किया. अदालत ने कहा कि इससे स्पष्ट है कि बच्ची दोनों से भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है और उसका हित दोनों के स्नेह में है.

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हाईकोर्ट ने मां की अंतरिम अभिरक्षा संबंधी याचिका स्वीकार कर ली
खंडपीठ ने कहा कि नाबालिग बच्ची के कल्याण के लिए मां की भावनाओं, उसकी सुविधा और बच्चे की भावनात्मक जरूरतों पर समुचित विचार किया जाना चाहिए था. अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को “गैर-व्यावहारिक”, “मनन के अभाव और “विकृत बताते हुए निरस्त कर दिया. अंततः हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मां की अंतरिम अभिरक्षा संबंधी याचिका स्वीकार कर ली. स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था अंतिम निर्णय तक लागू रहेगी. साथ ही फैमिली कोर्ट को मूल अभिरक्षा वाद का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया.
