Ravi Bharti
Ranchi: राजनीति में दो और दो हमेशा चार नहीं होते, कभी-कभी यह शून्य भी हो जाते हैं और कभी खेला भी कर देते हैं. झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए बिछी सियासी बिसात कुछ ऐसी ही कहानी कह रही है. कहने को तो यह लोकतंत्र का उत्सव है, लेकिन अंदरखाने यह एक ऐसा माइंड गेम बन चुका है, जहां एक वोट का इधर-उधर होना किसी के लिए लॉटरी तो किसी के लिए राजनीतिक दिवालियापन की वजह बन सकता है. 56 विधायकों के भारी-भरकम कुनबे के साथ सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन कागजों पर शेर नजर आ रहा है, लेकिन दिल की धड़कनें उनकी भी तेज हैं. क्योंकि एक वोट की कीमत क्या होती है, यह राज्यसभा चुनाव से बेहतर भला कौन जान सकता है.

समीकरणों का चक्रव्यूह, 28 का जादुई आंकड़ा और दिल की धड़कनें
सत्तारूढ़ गठबंधन के पास कुल 56 वोटों का मजबूत किला है. अंकगणित के उस्ताद कह रहे हैं कि जेएमएम के बैजनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा को अगर बराबर-बराबर यानी 28-28 वोट मिल जाएं, तो दोनों की नैया पार है. लेकिन राजनीति में अगर-मगर का खेल बड़ा जालिम होता है. 28 के इस कांटे के मुकाबले में जोखिम का स्तर हाई-वोल्टेज है. यदि इंडिया गठबंधन रणनीतिक तौर पर अपने किसी एक उम्मीदवार को सुरक्षित करने के लिए 28 से एक भी वोट ज्यादा (मान लीजिए 29 या 30) दिलाता है, तो दूसरे उम्मीदवार का पलड़ा अपने आप हल्का हो जाएगा. सोने पर सुहागा यह कि अगर गलती से भी एक वोट अमान्य या रद्द घोषित हो गया, तो पूरा का पूरा बना-बनाया समीकरण ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा.
पहली पसंद तो ठीक, दूसरी पर किसकी नजर
इस बार के चुनाव का असली सस्पेंस प्रथम वरीयता के वोट में नहीं, बल्कि द्वितीय वरीयता के छिपे हुए तीर में है. झारखंड विधानसभा के सभी 81 विधायकों के पास यह दोहरी ताकत है. इंडिया गठबंधन की रणनीति साफ है. अपने दोनों महारथियों के लिए पहली और दूसरी वरीयता के 28-28 वोट फिक्स कर दिए जाएं ताकि जीत का सर्टिफिकेट जेब में हो. लेकिन असली रोमांच तब शुरू होगा जब कुछ वोट रद्द होंगे या कोई माननीय वोटिंग से पैर पीछे खींच लेंगे. ऐसी स्थिति में सत्ता पक्ष के विधायकों की दूसरी पसंद यानी द्वितीय वरीयता का वोट अगर निर्दलीय प्रत्याशी की झोली में गिरा, तो पासा पलटते देर नहीं लगेगी. यह वैसा ही है जैसे परीक्षा में खुद का पेपर तो अच्छा गया, लेकिन एक्स्ट्रा मार्क्स पड़ोसी को पास करा गए.
मतों की अंकगणितीय पाठशाला
• झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में जीत का गणित 2701 अंक यानी सीधे शब्दों में कहें तो प्रथम वरीयता के 28 मतों का कोटा तय करता है.
• सत्ता पक्ष के कुनबे के पास कुल 56 वोट हैं. झारखंड मुक्ति मोर्चा अपने 34 विधायकों के साथ सबसे बड़ा भाई है. कांग्रेस के पास 16, राष्ट्रीय जनता दल के पास 4 और भाकपा-माले के पास 2 विधायक हैं.
• एनडीए के खेमे में कुल 24 सिपाही हैं, जिसमें भाजपा के 21, जदयू का 1, लोजपा (रामविलास) का 1 और आजसू पार्टी का 1 विधायक शामिल है.
• जेएलकेएम के जयराम महतो फिलहाल एकला चलो रे की मुद्रा में तटस्थ खड़े हैं.
JMM का सेफ गेम बनाम कांग्रेस का सहारा ढूंढो अभियान
इस चुनावी दंगल में जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम सबसे निश्चिंत मुद्रा में हैं. उनकी पार्टी के 34 में से 28 विधायक सीधे उनके नाम के आगे नंबर 1 लिख देंगे और वे आसानी से दिल्ली का टिकट कटा लेंगे. असली परीक्षा कांग्रेस के प्रणव झा की है. उन्हें अपनी पार्टी के 16 वोटों के अलावा जेएमएम के बचे हुए 6 वोट, राजद के 4 और माले के 2 विधायकों का उधार का सिंदूर चाहिए होगा. जब तक गठबंधन की यह केमिस्ट्री परफेक्ट रहेगी, तब तक प्रणव झा महफूज हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि राज्यसभा चुनावों में भीतरघात और क्रॉस वोटिंग जैसे शब्द अचानक से सच होने लगते हैं.
परिमल नाथवानी का मिशन इम्पॉसिबल
अब बात करते हैं निर्दलीय परिमल नाथवानी की, जो इस पूरे खेल के एक्स फैक्टर हैं. भाजपा के 21 और सहयोगियों (जदयू, आजसू, लोजपा-आर) के 3 वोटों को मिलाकर नाथवानी जी 24 के आंकड़े तक तो मुस्कुराते हुए पहुंच रहे हैं. लेकिन दिल्ली अभी दूर है, क्योंकि जादुई आंकड़ा 28 का है. यानी उन्हें प्रथम वरीयता के 4 और वोटों की दरकार है. सियासी गलियारों में चर्चा गरम है कि जेएलकेएम के जयराम महतो का 1 वोट उन्हें मिल सकता है, फिर भी 3 वोटों का शॉर्टफॉल रहेगा. अब ये 3 वोट कहां से आएंगे. क्या सत्ता पक्ष के कुछ माननीय अंतरात्मा की आवाज सुनेंगे या फिर द्वितीय वरीयता के वोटों की गिनती में कोई चमत्कार होगा? जो भी हो, झारखंड की यह राज्यसभा जंग अब महज एक चुनाव नहीं, बल्कि शह और मात का वह खेल बन चुकी है, जिसमें आखिरी मिनट तक सांसें थमी रहेंगी.
