Ranchi : झारखंड की लाइफलाइन कही जाने वाली नदियों पर आज यानी 10 जून से सन्नाटा पसरने जा रहा है. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण NGT के आदेश के अनुपालन में राज्य की सभी नदियों से बालू के उत्खनन और निकासी पर आगामी 15 अक्टूबर तक के लिए पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया गया है. खान एवं भूतत्व विभाग के निदेशक राहुल कुमार सिन्हा ने इस बाबत सूबे के सभी उपायुक्तों और जिला खनन पदाधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं. मानसून के दौरान जलीय पारिस्थितिकी को बचाने के लिए उठाया गया यह कानूनी कदम अपनी जगह बिल्कुल सही है, लेकिन इसके पीछे छिपा सप्लाई और रोजगार का गणित बेहद डरावना है. इस चार महीने के प्रतिबंध से पहले ही चरमराई बालू आपूर्ति व्यवस्था अब पूरी तरह ब्लैक होल में समाने की कगार पर है. जिससे राज्य का विकास का पहिया पूरी तरह थम सकता है.
गाइडलाइंस के तहत कड़ाई, 4 महीने तक नदियों में नो एंट्री
प्रशासनिक निर्देश के मुताबिक, सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइन 2016 और एंफोर्समेंट एंड मॉनीटरिंग गाइडलाइन फॉर सैंड माइनिंग-2020 के कड़े प्रावधानों के तहत एनजीटी, कोलकाता के आदेश का अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित किया जाना है. 10 जून से 15 अक्टूबर तक की इस मानसून अवधि में किसी भी नदी घाट से मशीन या मैन्युअल तरीके से बालू निकालना संज्ञेय अपराध माना जाएगा. सभी जिलों को निर्देश है कि वे अवैध माइनिंग को रोकने के लिए नदियों के आसपास गश्त और कड़ा पहरा बढ़ाएं.

मांग और आपूर्ति का डरावना गणित 60 फीसदी का ब्लैक होल
झारखंड के इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण क्षेत्र में बालू की मांग और वैध आपूर्ति के बीच की खाई पहले से ही चिंताजनक है. आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य को अपने बुनियादी ढांचे की रफ्तार बनाएं रखने के लिए हर दिन करीब 1.5 लाख से 2 लाख घन फीट (सीएफटी) बालू की सख्त जरूरत होती है. जनवरी से जून तक चलने वाले पीक कंस्ट्रक्शन सीजन में यह मांग चरम पर होती है. प्रतिबंध लगने से पहले ही बाजार में वैध सप्लाई में 60 फीसदी का भारी अंतर (शॉर्टेज) आ चुका है. यानी मांग के मुकाबले आधी से भी कम वैध बालू उपलब्ध थी. अब आज से नदियों पर ताला लगने के बाद यह कमी 100 फीसदी की तरफ बढ़ेगा. जिससे हाहाकार मचना तय है.
सरकारी फ्लैगशिप योजनाओं पर भी असर
- अबुआ आवास और पीएम आवास : राज्य सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता वाले इन ग्रामीण आवासों का काम बालू के बिना पूरी तरह ठप हो जाएगा.
- इंफ्रास्ट्रक्चर को झटका : करोड़ों की लागत से बन रहे पुल-पुलिया, सरकारी भवन और सड़कों का निर्माण कार्य कछुआ गति में आ जाएगा.
- काले बाजार का खेल : जब वैध बालू नहीं मिलेगी, तो अवैध बालू का खेल शुरू होगा. इससे आम जनता की जेब कटेगी, जो बालू पहले 3,000 से 4,000 रुपये प्रति ट्रैक्टर मिलती थी, उसकी कीमतें आसमान छुएंगी.
- खजाने को चपत और कानून-व्यवस्था : वैध खनन बंद होने से सरकारी खजाने को मिलने वाले अरबों रुपये के राजस्व (रॉयल्टी) का नुकसान होगा. वहीं दूसरी ओर, बालू के अवैध वर्चस्व और सिंडिकेट के कारण राज्य की कानून व्यवस्था भी दांव पर लग जाएगी.
4 लाख से अधिक परिवारों के रोजी-रोटी पर आफत
- घाटों के मजदूर : राज्य के विभिन्न बालू घाटों पर सीधे तौर पर लोडिंग और माइनिंग का काम करने वाले लगभग 50,000 से 70,000 मजदूरों का रोजगार छिन जाएगा. बिना किसी वैकल्पिक आय के, मानसून के इन चार महीनों में इनके घरों के चूल्हे बुझने की नौबत आ जाएगी.
- कंस्ट्रक्शन सेक्टर की चेन : बालू की किल्लत से जब निर्माण कार्य थमेगा, तो इस सेक्टर पर आश्रित लगभग 3 लाख लोगों के रोजगार पर असर पड़ेगा. इनमें मुख्य रूप से दिहाड़ी राजमिस्त्री, हेल्पर, ट्रक-हाइवा के मालिक और उनके ड्राइवर्स शामिल हैं, जिनकी रोजाना की कमाई इसी रेत की रफ्तार पर निर्भर करती है.
