Vinit Abha Upadhyay
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट में न्यायिक कार्यवाहियों में अंग्रेजी की जगह पर हिंदी भाषा को मान्यता देने की दिशा में प्रशासनिक और कानूनी हलचल शुरू हो गई है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस ऐतिहासिक प्रस्ताव पर झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम एस सोनक से उनकी राय और टिप्पणी मांगी है. इस कदम के बाद झारखंड स्टेट बार काउंसिल ने भी अपने सभी सदस्यों से 13 जून 2026 तक उनके विचार देने का अनुरोध किया है. इस पूरी प्रक्रिया के पीछे यह प्रयास है कि न्याय की प्रक्रिया को इतना सरल और सुलभ होना चाहिए कि वह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी आसानी से समझ आ सके. फ़िलहाल हाईकोर्ट की कानूनी प्रक्रियाओं का माध्यम केवल अंग्रेजी भाषा है. जिसके कारण आम नागरिकों से न्याय की समझ और पहुंच काफी दूर है.

पूर्व राज्यपाल ने राष्ट्रपति को भेजा था पत्र
झारखंड की अधिकांश आबादी हिंदी भाषा बोलती और समझती है. इसलिए इसे न्याय की भाषा बनाने के लिए यह पहल की जा रही है. यह पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल रमेश बैस ने 14 दिसंबर 2022 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र भेजा था और कहा था कि झारखंड में अंग्रेजी बोलने या समझने वाले लोग नगण्य हैं, फिर भी न्यायालय की भाषा अंग्रेजी बनी हुई है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे हिंदी भाषी राज्यों के हाईकोर्ट में पहले से ही हिंदी में कार्यवाहियां चल रही हैं, लेकिन झारखंड में यह व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है.
केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री ने मांगी राय
राज्यपाल के इस प्रस्ताव के बाद केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री ने जून 2023 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर स्थापित परंपराओं के तहत इस पर राय मांगी थी. जिसके बाद हाल ही में 20 मई 2026 को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को इस संबंध में पत्र लिखकर चर्चा को आगे बढ़ाया है. अगर झारखंड स्टेट बार काउंसिल, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और राष्ट्रपति भवन से इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिल जाती है, तो झारखंड हाईकोर्ट में यह एक बड़ा बदलाव होगा. जिससे झारखंड की आम जनता को अपनी भाषा में न्याय मिलना संभव हो सकेगा.
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