Hazaribagh : किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी सड़कों, इमारतों या बाजारों से नहीं होती. उसकी असली पहचान उन धरोहरों से बनती है, जो सदियों तक उसके इतिहास, संस्कृति और प्रकृति की कहानी कहती रहती हैं. हजारीबाग के लिए ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है कनहरी पहाड़. यह केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, प्रकृति, लोककथाओं और स्मृतियों का जीवंत संग्रहालय है. आज जब शहर तेजी से बदल रहा है, तब कनहरी पहाड़ अपनी खामोश मौजूदगी से बीते युगों की दास्तान सुनाता है. इसकी हर सीढ़ी, हर चट्टान और हर पेड़ मानो हजारीबाग के इतिहास का एक अध्याय अपने भीतर संजोए हुए है.
कैनरी से कनहरी बनने की कहानी
स्थानीय इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार, तीरनुमा आकार वाली इस पहाड़ी का नाम ब्रिटिश काल में लॉर्ड कैनरी के नाम पर पड़ा था. समय के साथ उच्चारण बदलता गया और “कैनरी” आम बोलचाल में “कनहरी” बन गया. आज भले ही यह नाम स्थानीय पहचान बन चुका हो, लेकिन इसके पीछे छिपा इतिहास हजारीबाग के औपनिवेशिक अतीत की ओर संकेत करता है.
जब कनहरी से गूंजती थी अजान
लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के सेनापति शाहबाज खान के अभियान के दौरान इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी और धार्मिक गतिविधियों का विस्तार हुआ. कहा जाता है कि उस दौर में पंडित जी रोड स्थित पीर मजार पर जलने वाले दीपक को देखकर कनहरी पहाड़ से अजान दी जाती थी. उस समय न तो बिजली थी और न ही ध्वनि विस्तारक यंत्र. कल्पना कीजिए, उस बुलंद आवाज की, जिसकी गूंज पूरे हजारीबाग को सुबह जगाती होगी. यह प्रसंग भले ही इतिहास के दस्तावेजों से अधिक लोकस्मृतियों में जीवित हो, लेकिन यह बताता है कि कनहरी पहाड़ लंबे समय से शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र रहा है.

अंग्रेज आए, शिकार हुआ और बदली तस्वीर
19वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में जब ब्रिटिश शासन का विस्तार हुआ और हजारीबाग बंगाल प्रेसीडेंसी के महत्वपूर्ण ग्रीष्मकालीन केंद्रों में शामिल हुआ, तब अंग्रेज अधिकारियों की नजर भी कनहरी पहाड़ की प्राकृतिक सुंदरता पर पड़ी. बताया जाता है कि 1839-40 के आसपास अंग्रेज अधिकारी यहां शिकार खेलने और सैर-सपाटे के लिए आया करते थे. इसी दौरान उन्होंने पीर मजार के सामने टेनिस कोर्ट विकसित कराया और वहां ऊंची दीवारें बनवाईं. स्थानीय लोग आज भी उन दीवारों को उस दौर की निशानी के रूप में देखते हैं.
ब्रदरहुड हाउस, कर्जन ग्राउंड और सैन्य बैरकों की अनकही कहानी
कनहरी के आसपास का इलाका कभी अंग्रेजी प्रशासनिक और सैन्य गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था. जहां आज कर्जन ग्राउंड, ब्रदरहुड हाउस, मिशन परिसर और विभिन्न सरकारी भवन दिखाई देते हैं, वहां कभी ब्रिटिश अधिकारियों के आवास और सैन्य बैरक हुआ करते थे. इतिहास के जानकार बताते हैं कि वर्तमान मिशन कॉलेजिएट स्कूल और पुराने पीटीसी क्वार्टर वाले क्षेत्र कभी सैन्य उपयोग में थे. यदि इन इमारतों की वास्तुकला को गौर से देखा जाए तो आज भी औपनिवेशिक काल की झलक दिखाई देती है.
फणीश्वरनाथ रेणु और कनहरी का साहित्यिक रिश्ता
कनहरी पहाड़ सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि साहित्यिक स्मृतियों का भी केंद्र रहा है. स्थानीय जनश्रुतियों में कहा जाता है कि हिंदी के महान आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने हजारीबाग प्रवास के दौरान कनहरी की सुंदरता का उल्लेख किया था. इसी तरह यह भी कहा जाता है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसकी प्राकृतिक छटा की प्रशंसा की थी. यद्यपि इन प्रसंगों के प्रामाणिक दस्तावेज सीमित हैं, लेकिन स्थानीय समाज में यह स्मृतियां आज भी जीवित हैं.
586 सीढ़ियां और शिखर से दिखता पूरा हजारीबाग
समुद्र तल से लगभग 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित कनहरी हिल तक पहुंचने के लिए लगभग 586 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. शिखर पर पहुंचते ही पूरा हजारीबाग शहर आंखों के सामने बिछा दिखाई देता है. यहां बना गुंबद, वॉच टावर और आसपास फैले घने जंगल पर्यटकों को रोमांचित कर देते हैं. सुबह की पहली किरणों से लेकर सूर्यास्त तक यहां का दृश्य किसी प्राकृतिक चित्रकला जैसा प्रतीत होता है.

पिकनिक स्पॉट से कहीं अधिक है कनहरी
हर वर्ष नववर्ष और छुट्टियों के दौरान हजारों लोग यहां पिकनिक मनाने पहुंचते हैं. लेकिन कनहरी का महत्व केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है. यह क्षेत्र जैव विविधता का खजाना है. यहां अनेक प्रकार के पक्षी, तितलियां, कीट-पतंगे, दुर्लभ वनस्पतियां और सदियों पुरानी लताएं मौजूद हैं. प्रकृति प्रेमियों के लिए यह एक खुली प्रयोगशाला की तरह है.
देश की सबसे ऊंची दीमक बांबी का घर
कनहरी पहाड़ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तब मिली जब यहां लगभग 9 फीट 8 इंच ऊंची दीमक की बांबी खोजी गई. इस संरचना को देश की सबसे ऊंची दीमक बांबियों में शामिल माना गया और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी स्थान मिला. अनुमान है कि यह बांबी सैकड़ों वर्षों पुरानी है और इसमें लाखों दीमकों का निवास है. इस खोज का श्रेय पर्यावरण प्रेमी स्वर्गीय मृत्युंजय शर्मा को जाता है, जिन्होंने लंबे समय से कनहरी क्षेत्र में इको-टूरिज्म और संरक्षण के लिए कार्य किया.
विरासत पर संकट के बादल
इतिहास और प्राकृतिक संपदा से समृद्ध होने के बावजूद कनहरी पहाड़ आज कई चुनौतियों से जूझ रहा है. करीब डेढ़ सौ वर्ष पुरानी सीढ़ियां जर्जर होती जा रही हैं। कई ऐतिहासिक संरचनाएं उपेक्षा का शिकार हैं. पर्यावरणीय दबाव, अतिक्रमण की आशंकाएं और अनियोजित पर्यटन भी चिंता का विषय हैं. स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि समय रहते संरक्षण की ठोस योजना नहीं बनी, तो आने वाली पीढ़ियां इस धरोहर को केवल तस्वीरों और किताबों में ही देख पाएंगी.

क्यों जरूरी है कनहरी को बचाना?
कनहरी सिर्फ एक पहाड़ी नहीं है. यह हजारीबाग का इतिहास है. यह शहर की पहचान है. यह प्रकृति का विश्वविद्यालय है. यह आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है. किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी विरासत को कितना सहेजता है. कनहरी का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि हजारीबाग की आत्मा को बचाने का अभियान है.
अंतिम बात : कनहरी अब भी पुकार रही है
जब आप कनहरी की सीढ़ियां चढ़ते हैं तो सिर्फ एक पहाड़ की चोटी तक नहीं पहुंचते, बल्कि सदियों के इतिहास, प्रकृति और स्मृतियों के बीच से गुजरते हैं. शायद यही वजह है कि कनहरी आज भी हर हजारीबागवासी से एक सवाल पूछती है. क्या हम अपनी इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा पाएंगे? क्योंकि सच यही है कि हजारीबाग की पहचान झील और कनहरी से है, और कनहरी की पहचान उसके इतिहास, हरियाली और संरक्षण से.
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