Hazaribagh : मंगलवार की सुबह बड़कागांव के बादाम कोल परियोजना क्षेत्र में कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया. सूरज पूरी तरह निकला भी नहीं था कि आसपास के गांवों से हजारों ग्रामीणों की भीड़ अचानक बीजीआर इंफ्रा माइनिंग के साइट ऑफिस की ओर बढ़ने लगी. देखते ही देखते पूरा परिसर लोगों से घिर गया और फिर शुरू हुआ वह घटनाक्रम जिसकी चर्चा अब पूरे जिले में हो रही है. टूटे हुए दरवाजे, उखड़ी हुई खिड़कियां, बिखरे हुए फर्नीचर, क्षतिग्रस्त मशीनें और वीरान पड़ा कार्यालय. यह दृश्य किसी सामान्य विरोध प्रदर्शन का नहीं. वर्षो से जमा हो रहे गुस्से के विस्फोट की कहानी बयां कर रहा था. आखिर यह गुस्सा इतना बड़ा क्यों हुआ ? स्थानीय लोगों के अनुसार यह कहानी आज या कल की नहीं है. बल्कि, इसकी जड़ें उस दिन से जुड़ी हैं जब इलाके में कोयला खनन परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई. ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी जमीनें गई. लेकिन बदले में न तो मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास एवं रोजगार के वादे पूरी तरह पूरे हुए. वर्षो से ग्रामीण विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास की मांग को लेकर आंदोलन करते रहे. कई बार धरना हुआ, कई बार विरोध प्रदर्शन हुए और कई बार प्रशासन तथा कंपनी प्रबंधन के साथ वार्ता भी हुई. लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकला.
फिर आया वह मोड़ जिसने माहौल को और गर्म कर दिया
कुछ दिनों पहले परियोजना क्षेत्र में बड़ा तनाव उस समय पैदा हुआ जब ग्रामीणों ने कंपनी के कुछ अधिकारियों को घेर लिया। मामला इतना बढ़ गया कि अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की खबर सामने आई. सूचना मिलते ही पुलिस पहुंची और अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया. कंपनी की शिकायत पर सैकड़ों ग्रामीणों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई. इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कुछ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. ग्रामीणों का आरोप है कि आंदोलन की आवाज दबाने के लिए यह कार्रवाई की गई, जबकि प्रशासन और कंपनी का पक्ष कानून व्यवस्था बनाए रखने का रहा.
और फिर मंगलवार की सुबह स्थानीय सूत्र बताते हैं कि गिरफ्तारियों और प्राथमिकी से नाराज ग्रामीणों में पिछले कई दिनों से आक्रोश बढ़ रहा था. मंगलवार के सुबह हजारों की संख्या में लोग साइट ऑफिस की ओर बढ़े. कुछ ही देर में कार्यालय परिसर चारों तरफ से घिर गया. इसके बाद जो हुआ उसने पूरे इलाके को दहला दिया. कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ हुई. दरवाजे तोड़े गए, खिड़कियां क्षतिग्रस्त कर दी गईं, फर्नीचर और अन्य सामान बर्बाद कर दिए गए. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कार्यालय में मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच अफरातफरी मच गई. कई लोग जान बचाकर वहां से निकल गए.
क्या यह सिर्फ तोड़फोड़ है या एक बड़े संघर्ष का संकेत?
बड़कागांव, बादाम और आसपास का इलाका पिछले कई वर्षों से खनन परियोजनाओं, भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के सवालों से जूझ रहा है. एक तरफ सरकार और कंपनियां इसे विकास, रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा से जोड़कर देखती हैं. दूसरी तरफ ग्रामीणों का कहना है कि विकास की कीमत उनकी जमीन, जंगल, पानी और भविष्य से वसूली जा रही है. यानी यह लड़ाई सिर्फ एक कार्यालय की नहीं, बल्कि जमीन बनाम विकास, रोजगार बनाम विस्थापन और अधिकार बनाम प्रशासनिक कार्रवाई की लड़ाई बनती जा रही है।
अब आगे क्या ?
घटना के बाद पूरे क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है. प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है. नुकसान का आकलन किया जा रहा है और घटना में शामिल लोगों की पहचान की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है. क्या यह हिंसा टाली जा सकती थी ? क्या समय रहते ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान किया गया होता तो यह नौबत नहीं आती ? या फिर कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई ही एकमात्र रास्ता है ? फिलहाल बड़कागांव की धरती पर तनाव है, सवाल हैं और इंतजार है उस जवाब का जो आने वाले दिनों में इस पूरे संघर्ष की दिशा तय करेगा.
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