Hazaribagh : जिले में इन दिनों नक्सलियों की लेवी वसूली और सरकारी कार्यालयों में कथित भ्रष्टाचार को लेकर नई बहस तेज हो गई है. ग्रामीणों का कहना है कि जिस तरह बंदूक के बल पर की जाने वाली लेवी वसूली गलत और आपराधिक है, उसी तरह सरकारी कामकाज के नाम पर होने वाली कथित अवैध वसूली पर भी समान गंभीरता से कार्रवाई होनी चाहिए. कटकमसांडी समेत आसपास के क्षेत्रों में पहले भाकपा माओवादी, तृतीय प्रस्तुति कमेटी और झारखंड प्रस्तुति कमेटी जैसे नक्सली संगठनों की सक्रियता रही है. इन संगठनों पर ठेकेदारों, व्यवसायियों और विकास कार्यों से जुड़े लोगों से लेवी वसूलने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. सुरक्षा एजेंसियों की जांचों में भी इन संगठनों के आर्थिक नेटवर्क और समानांतर टैक्स व्यवस्था जैसे पहलुओं की समय-समय पर पड़ताल होती रही है.
ग्रामीणों के आरोप, दफ्तरों में वसूली और असंवेदनशीलता
वहीं ग्रामीणों का आरोप है कि प्रखंड और जिला स्तर के कई सरकारी कार्यालयों में प्रमाण पत्र बनाने, भूमि मापी, योजनाओं की स्वीकृति, भुगतान और अन्य प्रशासनिक कार्यों में बिना पैसे दिए काम समय पर नहीं हो पाता. लोगों का कहना है कि इस तरह की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं. स्थानीय लोगों ने यह भी कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में कई बार अधिकारी और कर्मचारी ग्रामीणों को संदेह की नजर से देखते हैं, जिससे आम लोगों में भय और अविश्वास का माहौल बनता है. ग्रामीणों का मानना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ प्रशासन को जनता के प्रति अधिक संवेदनशील और सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए.
ग्रामीणों ने की निष्पक्ष जांच और सुशासन की मांग
ग्रामीणों ने यह भी मांग उठाई है कि यदि किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के विश्वसनीय आरोप सामने आते हैं, तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. साथ ही जांच में आरोप सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए. हालांकि ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है. किसी भी मामले में निष्पक्ष जांच, ठोस साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए, ताकि निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह सके. स्थानीय लोगों के अनुसार सुशासन तभी संभव है जब नक्सलवाद की लेवी, कथित भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग जैसी प्रवृत्तियों पर समान रूप से कठोर कार्रवाई हो. उनका कहना है कि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, सरकारी सेवाएं बिना रिश्वत और भय के उपलब्ध हों तथा प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह बने यही वास्तविक सुशासन की पहचान है.
