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हजारीबाग में ब्रिटिश दौर की छावनी और 1782 के ‘न्यू मिलिट्री रोड’ को लेकर ऐतिहासिक जानकारी सामने आई

Hazaribagh: कैप्टन बोडम के मिलिट्री चक्रव्यूह और स्कूलों-कॉलेजों के नीचे दफन छावनी के राज तो अब दुनिया के सामने आ चुके हैं....

Hazaribagh: कैप्टन बोडम के मिलिट्री चक्रव्यूह और स्कूलों-कॉलेजों के नीचे दफन छावनी के राज तो अब दुनिया के सामने आ चुके हैं. लेकिन ‘द बोडम बाजार फाइल्स’ की इस तीसरी कड़ी में हम उस पर्दे को उठाने जा रहे हैं, जिसके पीछे छुपा है एक ऐसा ग्लोबल सस्पेंस, जिसने हजारीबाग के इस छोटे से पठार को ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा रणनीतिक गढ़ बना दिया था. क्या आप जानते हैं कि बोडम बाजार का सीधा कनेक्शन उस जमाने में कलकत्ता (अब कोलकाता) और बनारस (वाराणसी) के बीच चलने वाली खुफिया मिलिट्री सप्लाई से था?

द सीक्रेट हाईवे: सन 1782 का ‘न्यू मिलिट्री रोड’

कहानी में सस्पेंस का नया मोड़ आता है सन 1782 में. ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने दो सबसे बड़े केंद्रों-कलकत्ता (जो उनकी राजधानी थी) और बनारस (जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम था)-के बीच फौज और हथियारों को तेजी से भेजने के लिए एक सुरक्षित रास्ते की तलाश थी. जीटी रोड उस वक्त पूरी तरह सुरक्षित और तैयार नहीं था. तब ब्रिटिश इंजीनियरों ने घने जंगलों और पहाड़ों को चीरते हुए एक बेहद गुप्त और सुरक्षित रास्ता बनाया, जिसे नाम दिया गया ‘न्यू मिलिट्री रोड’. और इस पूरे हाईवे के बिल्कुल बीचों-बीच, रणनीतिक रूप से सबसे सुरक्षित ऊंचाई पर कौन-सा शहर चुना गया? अपना हजारीबाग!

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कैप्टन बोडम ने इसी न्यू मिलिट्री रोड के किनारे अपनी छावनी और ‘बोडम बाजार’ को इस तरह स्थापित किया कि कलकत्ता से बनारस आने-जाने वाली ब्रिटिश फौजें, हथियार और खुफिया संदेशवाहक यहां रुक सकें, आराम कर सकें और रसद (सप्लाई) ले सकें. यानी आज जिसे हम एक स्थानीय बाजार समझते हैं, वह कभी दो महान शहरों को जोड़ने वाली मिलिट्री लाइफलाइन का दिल हुआ करता था.

द ट्विस्ट: सन 1884 और वो आखिरी बिगुल…

सालों तक हजारीबाग का यह कंटोनमेंट इलाका और बोडम बाजार बारूद की गंध, घोड़ों की टापों और ब्रिटिश हुकूमत के रोब से सुलगता रहा. लेकिन वक्त का पहिया हमेशा एक-सा नहीं रहता. कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आया सन 1884 में. 19वीं सदी के अंत तक अंग्रेजों ने इस पूरे इलाके पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया था. अब उन्हें हजारीबाग के इस शांत पठार पर इतनी बड़ी फौज रखने की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी. प्रशासनिक और सैन्य रणनीतियों के तहत आदेश आया- “हजारीबाग छावनी को भंग किया जाए और फौज को रामगढ़ तथा अन्य सक्रिय मिलिट्री बेस पर शिफ्ट किया जाए.”

सन 1884 की वह एक धुंधली शाम थी, जब हजारीबाग कंटोनमेंट में आखिरी बार ब्रिटिश मिलिट्री का बिगुल बजा. ‘रामगढ़ बटालियन’ और मिलिट्री पुलिस के दस्ते एक-एक कर अपने साजो-सामान के साथ यहां से कूच कर गए. बैरक खाली हो गए, परेड ग्राउंड में सन्नाटा पसर गया और वे आलीशान प्रशासनिक इमारतें सूनी हो गईं.

द ट्रांसफॉर्मेशन: बंदूक की नाल से तराजू के पलड़े तक

जब फौज चली गई, तो सबको लगा कि कैप्टन बोडम का यह शहर खंडहर बन जाएगा. लेकिन यहीं से शुरू हुआ बोडम बाजार का वह रूप, जिसे हम आज देखते हैं. खाली हुए मिलिट्री बैरकों और समानांतर गलियों को स्थानीय और बाहर से आए मारवाड़ी, गुजराती तथा क्षेत्रीय व्यापारियों ने अपनी सूझबूझ से संभाल लिया. जहां कभी फौजियों के राशन गोदाम थे, वहां अनाज की बड़ी-बड़ी आढ़तें (मंडियां) खुल गईं. जहां हथियारों की मरम्मत होती थी, वहां बर्तनों और कपड़ों का थोक व्यापार शुरू हो गया. कैप्टन बोडम का वह अनुशासित मिलिट्री ग्रिड पैटर्न, बिना एक भी इंच बदले, छोटानागपुर का सबसे बड़ा ‘कमर्शियल हब’ बन गया.

सस्पेंस का क्लाइमेक्स अभी बाकी है…

1782 के सीक्रेट हाईवे से लेकर 1884 में फौज के विदा होने तक, बोडम बाजार ने बंदूक की नाल से लेकर तराजू के पलड़े तक का एक लंबा और हैरतअंगेज सफर तय किया है. लेकिन यह कहानी यहां भी खत्म नहीं होती. जब फौज यहां से गई, तो वह अपने पीछे सिर्फ खाली बैरक नहीं छोड़ गई थी, बल्कि छोड़ गई थी एक बेहद मजबूत और खूंखार जेल का ढांचा, जो आगे चलकर भारत की आजादी के सबसे बड़े महासंग्राम का केंद्र बनने वाला था. मेजर बोडम के इस चक्रव्यूह का आखिरी और सबसे बड़ा खुलासा अभी बाकी है.

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