पलामू टाइगर रिजर्व मामला: विलेज रिलोकेशन प्लान पर HC सख्त, सरकार को 2 महीने का समय

Ranchi: पलामू टाइगर रिजर्व के कोर और प्रोटेक्टेड एरिया से गांवों के विस्थापन को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए...

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Ranchi: पलामू टाइगर रिजर्व के कोर और प्रोटेक्टेड एरिया से गांवों के विस्थापन को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को दो महीने के भीतर विस्थापित ग्रामीणों को जमीन का पट्टा देने और शेष गांवों के स्थानांतरण की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश दिया है. विकास महतो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास की प्रक्रिया में हो रही देरी अब स्वीकार्य नहीं है. सुनवाई के दौरान एडवोकेट जनरल ने अदालत को जानकारी दी कि विभागीय मंत्री द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है और फाइल अब कैबिनेट अप्रूवल के लिए भेजी जा चुकी है. अदालत ने इस पर प्रगति की निगरानी करते हुए निर्धारित समयसीमा के भीतर ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को निर्धारित की गई है.

क्या है पूरा मामला

इस मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2017 से जुड़ी है, जब वन विभाग ने पलामू टाइगर रिजर्व के बफर जोन को कोर एरिया में बदलने की योजना के तहत आठ गांवों को विस्थापन का नोटिस जारी किया था. मुआवजे को लेकर उस समय ग्रामीणों में व्यापक विरोध हुआ था, हालांकि बाद में बातचीत के जरिए सहमति बनी और जैगीर गांव को पोलपोल के पास लगभग 75 एकड़ भूमि पर बसाया गया. इसके बाद लातू, कुजुरम और मंडल डैम प्रभावित क्षेत्रों के गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई. हालांकि, अदालत के समक्ष सबसे गंभीर समस्या यह आई कि जिन ग्रामीणों को पहले चरण में विस्थापित कर बसाया गया, उन्हें अब तक जमीन का कानूनी पट्टा नहीं दिया गया है. पट्टा नहीं मिलने के कारण विस्थापित परिवार बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं. यही वजह है कि अन्य गांवों के लोग भी अब विस्थापन को लेकर हिचकिचा रहे हैं, जिससे पूरी रिलोकेशन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. झारखंड हाईकोर्ट इस मामले में पहले भी कई बार नाराजगी जता चुका है. मार्च 2026 में चीफ जस्टिस एम.एस. सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की थी और जूनियर अधिकारियों द्वारा दाखिल हलफनामों को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का भी निर्देश दिया था और एमीकस क्यूरी के सुझावों पर हुई कार्रवाई का ब्यौरा मांगा था. साथ ही, बाघों के कॉरिडोर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए टाइगर रिजर्व के भीतर से गुजरने वाली रेलवे लाइनों और सड़कों के शिफ्टिंग पर भी योजना तैयार करने को कहा गया था.

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