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करोड़ों का किराया और रसूखदारों की जेबें, पर खुद ‘खंडहर’ होने की कगार पर हजारीबाग का स्वर्णकार धर्मशाला!

Hazaribagh: सरकार का सिस्टम हो या समाज की व्यवस्था, भ्रष्टाचार के दीमक से आज कोई भी कोना अछूता नहीं रहा है. हजारीबाग...

हजारीबाग का स्वर्णकार धर्मशाला
हजारीबाग का स्वर्णकार धर्मशाला

Hazaribagh: सरकार का सिस्टम हो या समाज की व्यवस्था, भ्रष्टाचार के दीमक से आज कोई भी कोना अछूता नहीं रहा है. हजारीबाग शहर के बीचों-बीच स्थित स्वर्णकार धर्मशाला (Swarnkar Dharamshala) आज पूरे स्वर्णकार व्यवसायी समाज के लिए एक ऐसा रहस्यमयी दलदल और ‘मिस्ट्री’ बन चुका है, जिसके मालिकाना हक और इसके भीतर चल रहे खेल को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं. इस गंभीर और संवेदनशील मामले को हजारीबाग के जाने-माने समाजसेवी राजकुमार सोनी ने प्रमुखता से उठाया है. राजकुमार सोनी द्वारा मामला उठाए जाने के बाद समाज के प्रबुद्ध और जागरूक लोगों के बीच आज यह यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि करोड़ों की कीमत वाली यह भव्य संपत्ति क्या पूरे हजारीबाग के स्वर्णकार समाज की है, या फिर कुछ गिने-चुने स्वघोषित ट्रस्टियों की निजी जागीर बनकर रह गई है?

लाखों का रेंट, मगर बदहाल व्यवस्था

जमीनी हकीकत पर नजर दौड़ाएं तो इस धर्मशाला से हर महीने दुकानों और व्यावसायिक गतिविधियों के जरिए लाखों रुपये का किराया वसूला जाता है. यही नहीं, लगन और शादियों के सीजन में इस भवन को बड़े-बड़े कार्यक्रमों के लिए मोटी रकम पर बुक किया जाता है. आम जनता इस आलीशान भवन की बुकिंग के लिए अच्छा-खासा पैसा वहन करती है, लेकिन इस मोटी कमाई के बदले भवन की दुर्दशा देखकर किसी का भी कलेजा कांप उठेगा. आज हालात ऐसे बदतर हो चुके हैं कि इस भवन के बगल की गली से गुजरने वाले लोग नाक बंद करके चलने को मजबूर हैं. चारों तरफ गुटखा और पान की पीक थूकी हुई दिखाई देती है, जिससे पूरी इमारत बदरंग हो चुकी है.

तेजाब का धुआं और कचरे का अंबार

धर्मशाला परिसर में संचालित दुकानों और कारखानों द्वारा रोज निकलने वाला भारी कचरा डंप करने के बजाय सीधे सार्वजनिक गली में ही फेंक दिया जाता है. इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि स्वर्ण आभूषणों की साफ-सफाई और निर्माण में इस्तेमाल होने वाले तेजाब के जानलेवा धुएं से यह पूरी बहुमंजिला इमारत भीतर ही भीतर खोखली और जर्जर होती जा रही है. लेकिन इस भीषण बर्बादी और पर्यावरण के नुकसान पर आंखें मूंदे बैठे ट्रस्टियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है. उन्हें सिर्फ और सिर्फ हर महीने आने वाले सुविधा शुल्क और रेंट से सरोकार रह गया है.

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बुनियाद कमजोर, ऊपर लिफ्ट निर्माण

धर्मशाला की बदहाली के बीच इन दिनों यहां एक आलीशान लिफ्ट का निर्माण कार्य धड़ल्ले से कराया जा रहा है. इस आधुनिक चकाचौंध पर सवाल उठाते हुए समाजसेवी राजकुमार सोनी और समाज के जागरूक लोगों ने ट्रस्टियों से सीधे तौर पर पूछा है कि “लिफ्ट लगाना गलत नहीं है, लेकिन जिस भवन की बुनियाद ही दुकानदारों की लापरवाही और तेजाब के धुएं से खंडहर हो रही हो, वहां पहले बिल्डिंग को मजबूत करना अनिवार्य था या आलीशान लिफ्ट लगाना?” जब नीचे की नींव ही कमजोर हो रही है, तो बिल्डिंग के ऊपरी तलों को बढ़ाने और चकाचौंध दिखाने से समाज को क्या फायदा होने वाला है?

ट्रस्टियों से मांगा हिसाब

हजारीबाग के आम स्वर्णकार व्यवसायियों और समाज के युवाओं ने अब इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है. समाजसेवी राजकुमार सोनी की इस पहल का समर्थन करते हुए समाज ने वर्तमान ट्रस्टियों से पुरजोर आग्रह और मांग की है कि जल्द से जल्द भवन की मरम्मत कराई जाए और तेजाब व गंदगी के इस नेक्सस (Nexus) पर रोक लगाई जाए. ट्रस्टी सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करें कि क्या वे इस भवन को आजीवन अपनी बपौती मानकर चलाएंगे या इसमें हजारीबाग के आम स्वर्णकार व्यवसायियों का भी कोई हक और अधिकार है?

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