हजारीबाग : खाकी पर दाग या साठगांठ? हजारीबाग में 4 संदिग्ध मौतें, पुलिस का रहस्यमयी मौन, न पोस्टमार्टम हुआ, न दर्ज हुई FIR

Hazaribagh : हजारीबाग के बड़कागांव और उरीमारी थाना क्षेत्रों में हाल के दिनों में हुई चार संदिग्ध मौतों ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर...

Hazaribagh : हजारीबाग के बड़कागांव और उरीमारी थाना क्षेत्रों में हाल के दिनों में हुई चार संदिग्ध मौतों ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक के बाद एक हुई इन घटनाओं में न तो FIR दर्ज की गई और न ही पोस्टमार्टम कराया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं. पुलिस की चुप्पी और कार्रवाई में देरी ने स्थिति को और भी संदिग्ध बना दिया है. स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि अवैध गतिविधियों में शामिल लोगों को कहीं न कहीं संरक्षण दिया जा रहा है. इससे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है और प्रशासन की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं.

दोपहर का वो खूनी खेल और छोटेलाल गंझू की रहस्यमयी सुरंग

शनिवार, 4 जुलाई 2026 की दोपहर. उरीमारी क्षेत्र के लुरुंगा इलाके में रोज़ की तरह कोयले का अवैध खेल धड़ल्ले से चल रहा था. स्थानीय रसूखदार और कोयला माफिया छोटेलाल गंझू के इशारे पर मजदूर अपनी जान हथेली पर रखकर अवैध खदान की अंधेरी सुरंगों में उतरे थे. किसी को अंदाजा नहीं था कि मौत ठीक उनके सिर के ऊपर मंडरा रही है. दोपहर के वक्त अचानक एक जोरदार आवाज के साथ खदान की चाल धंस गई. टन वजनी मलबे के नीचे कई जिंदगियां दफन हो गईं. चीख-पुकार के बीच जब तक लोग कुछ समझ पाते, दो मजदूरो सुरेन्द्र गंझू और शिवनाथ बेदिया ने मौके पर ही तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया. हादसे के बाद इलाके में हड़कंप मच गया, लेकिन इसके बाद जो हुआ वो और भी खौफनाक था. पुलिस को घटना की पल-पल की जानकारी थी, लेकिन छोटेलाल गंझू के रसूख और तंत्र के आगे खाकी ने घुटने टेक दिए. मामले को रफा-दफा करने का खेल शुरू हुआ. बिना पंचनामा, बिना किसी कानूनी औपचारिकता और बिना पोस्टमार्टम कराए ही दोनों शवों को आनन-फानन में गायब कर दिया गया. फाइल को दोपहर में ही इस तरह दबाया गया जैसे लुरुंगा में कभी कुछ हुआ ही नहीं था.

राउतपारा का वो अधूरा सच और बंशीलाल चौक का ‘जहरीला’ सस्पेंस

यह खूनी खेल उरीमारी तक ही सीमित नहीं था. इससे ठीक कुछ दिन पहले बड़कागांव थाना क्षेत्र के बादम अंतर्गत राउतपारा में भी मौत का ऐसा ही एक तांडव देखा गया था. वहां भी अवैध उत्खनन के दौरान मलबे की चपेट में आने से स्थानीय मजदूर सचिन साव की दर्दनाक मौत हो गई थी. उस वक्त भी स्थानीय लोगों का गुस्सा फूटा था, लेकिन पुलिस ने खेल पुराना ही खेला. सचिन साव की मौत को भी कागजों से पूरी तरह गायब कर दिया गया और बिना किसी आधिकारिक रिकॉर्ड के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. लेकिन सस्पेंस की आखिरी और सबसे सनसनीखेज कड़ी हजारीबाग शहर के बीचों-बीच स्थित बंशीलाल चौक पर खुली. जून के महीने में पुलिस की टीम ने मादक पदार्थों की तस्करी की गुप्त सूचना पर एक ठिकाने पर औचक दबिश दी. पुलिस को सामने देख वहां मौजूद एक महिला ड्रग पैडलर, जो खुद इस पूरे नशीले नेटवर्क को ऑपरेट करती थी, बुरी तरह घबरा गई. जेल जाने और पकड़े जाने के डर से उसने आव देखा न ताव, पास में रखा ब्राउन शुगर का पूरा पैकेट ही सीधे निगल लिया. पुलिसकर्मियों की आंखों के सामने ही महिला तड़पने लगी और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई. उसकी मौत को प्राइवेट अस्पताल में ले जा कर हार्ट अटैक में तब्दील कर दिया गया. इस हाई-प्रोफाइल और संदेहास्पद मामले में डॉक्टरों के बोर्ड से पोस्टमार्टम होना लाजमी था, ताकि मौत के कारणों का वैज्ञानिक सच सामने आ सके, लेकिन यहां भी रहस्यमयी तरीके से पूरी कहानी को दबा दिया गया.

जब रक्षक ही बन जाएं राजदार , तो इंसाफ की आस किससे?

देश के दंड विधान और पुलिस मैनुअल की मानें तो किसी भी अस्वाभाविक, संदेहास्पद या दुर्घटनाजनित मौत के मामले में पुलिस का यह पहला और सबसे अनिवार्य कर्तव्य है कि वह शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराए. अदालत की चौखट पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही वह ब्रह्मास्त्र होती है जो साबित करती है कि मौत के पीछे की असली वजह क्या थी. लेकिन हजारीबाग के इन चारों मामलों में इस पूरी प्रक्रिया को हवा में उड़ा दिया गया. अब शहर से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या हजारीबाग पुलिस अपराधियों को पकड़ने के बजाय उनके काले धंधों की राजदार बन चुकी है? पहले जहां माफिया केवल मीडिया और गवाहों को मैनेज करते थे, वहीं अब सीधे व्यवस्था पर ही साठगांठ के संगीन आरोप लग रहे हैं. जागरूक नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने अब यह मांग तेज कर दी है कि यदि पुलिस मुख्यालय की गोपनीय शाखा (CID/Special Branch) या कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी हजारीबाग के इन थानों के डेली डायरी और यूटीआर की निष्पक्ष जांच करे, तो खाकी की आड़ में छिपे कई बड़े चेहरों का बेनकाब होना बिल्कुल तय है. फिलहाल, इस पूरे महा-सस्पेंस पर पुलिस के आला अधिकारियों ने अपने होठ सिल रखे हैं, जिसने जनता के भीतर के आक्रोश को बारूद के ढेर में तब्दील कर दिया है.

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