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हजारीबाग: शिक्षा का मंदिर या गौशाला? झारखंड के इस सरकारी स्कूल में रोज़ गोबर उठाकर पढ़ाई शुरू करते हैं शिक्षक और छात्र

Hazaribagh: झारखंड सरकार एक ओर सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर माहौल उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कर रही...

हजारीबाग: शिक्षा का मंदिर या गोशाला? झारखंड के इस सरकारी स्कूल में रोज़ गोबर उठाकर पढ़ाई शुरू करते हैं शिक्षक और छात्र

Hazaribagh: झारखंड सरकार एक ओर सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर माहौल उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड स्थित उत्क्रमित उच्च विद्यालय, बेडम की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां करती है. यहां शिक्षा का मंदिर छुट्टी के बाद गोशाला में बदल जाता है. हालात ऐसे हैं कि हर सुबह शिक्षक और छात्र-छात्राओं को पढ़ाई शुरू करने से पहले पूरे विद्यालय परिसर से गोबर हटाना पड़ता है. विद्यालय परिसर में चारों ओर फैली गंदगी, बरामदों में बिखरा गोबर और कमरों में घूमते मवेशियों की तस्वीरें शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं.

रोज़ गोबर हटाकर शुरू होती है पढ़ाई

विद्यालय के शिक्षकों के अनुसार यह कोई एक-दो दिन की समस्या नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परेशानी है. स्कूल में छुट्टी होने के बाद स्थानीय लोग अपने मवेशियों को खुलेआम विद्यालय परिसर में छोड़ देते हैं. पूरी रात मवेशी स्कूल में रहते हैं और सुबह परिसर गोबर से पट जाता है। इसके बाद शिक्षक और छात्र मिलकर सबसे पहले गोबर हटाते हैं, पानी से बरामदे और कमरों की सफाई करते हैं. सफाई पूरी होने के बाद ही कक्षाएं शुरू हो पाती हैं.

किताबों की खुशबू नहीं, गोबर की दुर्गंध से होता है बच्चों का स्वागत

जहां बच्चों का स्वागत साफ-सुथरे और प्रेरणादायक शैक्षणिक वातावरण में होना चाहिए, वहां उन्हें हर सुबह गोबर और दुर्गंध का सामना करना पड़ता है. इससे बच्चों का पढ़ाई में मन भी प्रभावित होता है और उनका कीमती समय भी सफाई में बर्बाद हो जाता है. विद्यालय परिसर की यह स्थिति विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनती जा रही है.

प्रभारी प्रधानाध्यापक ने जताई नाराजगी

विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक कमलकांत ने बताया कि यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है. कई बार स्थानीय स्तर पर लोगों को समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकला. उन्होंने कहा कि छुट्टी के बाद लोग अपने मवेशियों को विद्यालय परिसर में छोड़ देते हैं, जिसके कारण अगली सुबह पूरा परिसर गोबर से भर जाता है. शिक्षक और बच्चों को पहले सफाई करनी पड़ती है, उसके बाद ही पढ़ाई शुरू हो पाती है.

चहारदीवारी नहीं होने से बढ़ी समस्या

ग्रामीणों और विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि विद्यालय की चहारदीवारी नहीं होने के कारण यह समस्या लगातार बनी हुई है. खुला परिसर होने से लोग इसे पशुओं को बांधने और छोड़ने के लिए सुरक्षित स्थान मान लेते हैं. विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि यदि जल्द चहारदीवारी का निर्माण करा दिया जाए तो इस समस्या से काफी हद तक निजात मिल सकती है.

बच्चों के स्वास्थ्य पर भी मंडरा रहा खतरा

ग्रामीणों के अनुसार पशुओं के गोबर और गंदगी के बीच पढ़ाई करना बच्चों में संक्रमण और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. लगातार गंदगी रहने से विद्यालय का शैक्षणिक माहौल भी प्रभावित हो रहा है.

शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

एक ओर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक और विद्यार्थियों को रोज़ गोबर साफ कर पढ़ाई शुरू करनी पड़ रही है. यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी दोनों पर सवाल खड़े करती है. अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस गंभीर मामले का संज्ञान लेकर विद्यालय की चहारदीवारी का निर्माण कराते हैं या फिर बेडम विद्यालय के शिक्षक और छात्र आगे भी रोज़ गोबर उठाकर अपनी पढ़ाई शुरू करने को मजबूर रहेंगे.

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