Hazaribagh : हजारीबाग के जमीन कारोबारी और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसे खौफनाक और हैरान कर देने वाले मामले ने तूल पकड़ लिया है, जिसकी गूंज अब सीधे उच्च न्यायालय तक जा पहुंची है. शहर के सारले मौजा में स्थित करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक की बाजार मूल्य वाली 21 एकड़ बेशकीमती जमीन से जुड़े कथित महाघोटाले ने अब एक बड़ा और निर्णायक कानूनी मोड़ ले लिया है. न्यायालय के कड़े रुख और स्पष्ट आदेश के बाद इस पूरे मामले में FIR दर्ज करने का निर्देश जारी कर दिया गया है. अदालत के इस आदेश के बाद अब पूरे प्रकरण की कमान पुलिस के हाथों में होगी. इस बड़ी कानूनी कार्रवाई की सुगबुगाहट मात्र से ही हजारीबाग के जमीन सिंडिकेट और राजस्व विभाग (रजिस्ट्री व रिकॉर्ड रूम) के भीतर हड़कंप मच गया है.
रिकॉर्ड रूम में सर्जिकल स्ट्राइक: सरकारी दस्तावेजों के साथ सुनियोजित खेल
यह पूरा मामला हजारीबाग के सारले मौजा के अंतर्गत आने वाली 21 एकड़ की प्राइम लोकेशन की जमीन से जुड़ा है. मामले को अदालत तक खींचकर ले जाने वाले पावर ऑफ अटॉर्नी धारक राजेश मिश्रा ने बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं. शिकायतकर्ता राजेश मिश्रा का सीधा आरोप है कि जिला समाहरणालय के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले रिकॉर्ड रूम में रखे गए मूल सरकारी दस्तावेजों के साथ बेहद सुनियोजित और शातिर तरीके से छेड़छाड़ की गई है. करोड़ों रुपये मूल्य की इस जमीन के असली कागजातों और पन्नों को बदलकर पूरी राजस्व व्यवस्था को ही चुनौती दे दी गई. आरोप है कि मूल दस्तावेजों में इस कदर हेरफेर की गई कि वास्तविक जमीन का रिकॉर्ड कुछ दूसरे रसूखदार लोगों के नाम पर ‘ओवरलैप’ कर दिया गया, जिससे जमीन के वास्तविक और कानूनी मालिकों का मालिकाना हक पूरी तरह प्रभावित हो गया.

21 एकड़ का गणित: 9 एकड़ सरकारी भूमि बेचने का भी आरोप, फॉरेंसिक ने खोली पोल
राजेश मिश्रा द्वारा साझा किए गए तथ्यों के अनुसार, इस विवादित 21 एकड़ जमीन का गणित बेहद उलझा हुआ और गंभीर है. उनका दावा है कि इस कुल भूमि में से लगभग 9 एकड़ जमीन पूरी तरह से सरकारी (गैर-मजरूआ या खास) भूमि है, जबकि बची हुई शेष 12 एकड़ जमीन का सेटलमेंट (बंदोबस्ती) ब्रिटिश काल के दौरान वर्ष 1928 में ही वैध तरीके से हुआ था. शिकायतकर्ता के अनुसार, वर्ष 2013 में उन्हें पहली बार इस बड़े फर्जीवाड़े और सरकारी दस्तावेजों में की गई गड़बड़ी का अंदेशा हुआ था. इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और कानूनी प्रक्रिया के तहत सरकारी रिकॉर्ड की प्रमाणित कॉपियां निकलवाकर उसकी ‘फॉरेंसिक जांच’ कराई. राजेश मिश्रा का दावा है कि फॉरेंसिक लैब की आधिकारिक रिपोर्ट में भी यह साफ-साफ प्रमाणित हो चुका है कि सरकारी रिकॉर्ड और पुराने दस्तावेजों के पन्नों के साथ व्यापक स्तर पर केमिकल या अन्य तरीकों से छेड़छाड़ की गई है.
पुलिस की रडार पर सिंडिकेट: क्या खुलेंगे सफेदपोशों के राज?
अदालत के सख्त आदेश पर अब जब पुलिस इस मामले में आधिकारिक तौर पर FIR दर्ज कर रही है, तो जांच की आंच कई बड़े चेहरों तक पहुंचने की पूरी संभावना है. शिकायतकर्ता का कहना है कि अगर पुलिस इस मामले की पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और गहराई से तकनीकी जांच करती है, तो हजारीबाग के इस कथित जमीन घोटाले में कई बड़े प्रशासनिक अधिकारियों, कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों, राजस्व उप-निरीक्षकों और जमीन कारोबार से जुड़े शहर के कई सफेदपोश व प्रभावशाली लोगों का मुखौटा उतर सकता है. हालांकि, इस पूरे मामले में एक पहलू यह भी है कि ये तमाम गंभीर आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता के दावों, निजी स्तर पर कराई गई फॉरेंसिक रिपोर्ट और शुरुआती अदालती दस्तावेजों पर आधारित हैं. इन आरोपों की अंतिम सत्यता और इस फर्जीवाड़े की वास्तविक गहराई पुलिस की आगामी तफ्तीश, गवाहों के बयानों और न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद ही पूरी तरह साफ हो पाएगी. लेकिन इतना तय है कि इस FIR के बाद हजारीबाग में जमीन के अवैध धंधेबाजों की रात की नींद उड़ चुकी है.
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