समुद्र में गायब हो जाते हैं जहाज… फिर भी पहुंच जाता है तेल. क्या है “डार्क ट्रांजिट” का रहस्य?

News Desk: दुनिया की राजनीति और व्यापार में कई बार ऐसी गतिविधियां होती हैं जो खुले तौर पर नहीं दिखतीं, लेकिन उनका...

News Desk: दुनिया की राजनीति और व्यापार में कई बार ऐसी गतिविधियां होती हैं जो खुले तौर पर नहीं दिखतीं, लेकिन उनका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. इन्हीं में से एक है डार्क ट्रांजिट.

डार्क ट्रांजिट क्या है?
डार्क ट्रांजिट का मतलब होता है जब जहाज, टैंकर या मालवाहक वाहन अपना लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम (AIS) बंद करके यात्रा करते हैं ताकि उनकी गतिविधि सार्वजनिक रूप से ट्रैक न हो सके.

यह तरीका अक्सर उन हालात में इस्तेमाल किया जाता है जब

•किसी देश पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध (Sanctions) लगे हों
•युद्ध या तनाव की स्थिति हो
•या तेल, गैस और अन्य संवेदनशील सामान को गुप्त रूप से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना हो.

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वर्तमान वैश्विक हालात में क्यों चर्चा में है?
इन दिनों पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान से जुड़े विवाद और कच्चे तेल की राजनीति के बीच डार्क ट्रांजिट फिर चर्चा में है.

जब किसी देश पर प्रतिबंध लगते हैं, तब कई बार तेल टैंकर समुद्र में अपना ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं, ताकि उनकी असली लोकेशन और गंतव्य का पता न चल सके.
इसे ही आम भाषा में डार्क शिपिंग या डार्क ट्रांजिट कहा जाता है.

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हाल का एक ताजा उदाहरण
हाल ही में खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव के बीच एक तेल टैंकर ने डार्क ट्रांजिट का इस्तेमाल किया. रिपोर्ट्स के अनुसार एक लाइबेरिया फ्लैग तेल टैंकर Shenlong, जिसमें सऊदी अरब के रास तनूरा पोर्ट से कच्चा तेल लादा गया था, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरते समय कुछ समय के लिए अपना AIS ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिया. इसका मतलब यह था कि जहाज कुछ समय के लिए रडार और सार्वजनिक ट्रैकिंग सिस्टम से गायब हो गया, यानी वह डार्क मोड में यात्रा कर रहा था. बाद में यह टैंकर सुरक्षित रूप से मुंबई पोर्ट पहुंच गया, जहां कच्चा तेल उतारा गया. विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान-अमेरिका तनाव और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के कारण कई जहाज सुरक्षा कारणों से या ट्रैकिंग से बचने के लिए इस तरह का तरीका अपना रहे हैं.

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इसका असर दुनिया पर कैसे पड़ता है?

डार्क ट्रांजिट सिर्फ एक तकनीकी चाल नहीं है, इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है
•तेल की सप्लाई और कीमतों में अचानक उतार चढ़ाव
•शेयर बाजार में अनिश्चितता
•शिपिंग और बीमा कंपनियों के लिए जोखिम
•अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पारदर्शिता की कमी

हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और बाजार में घबराहट की एक वजह यह भी मानी जा रही है कि कई टैंकर डार्क मोड में सफर कर रहे हैं, जिससे असली सप्लाई का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है.

किन देशों से जुड़ा है डार्क ट्रांजिट का नेटवर्क?

वैश्विक स्तर पर अक्सर इन देशों से जुड़े जहाज इस तकनीक का इस्तेमाल करते पाए गए हैं

•ईरान-प्रतिबंधों के बावजूद तेल निर्यात करने के लिए
•रूस-पश्चिमी प्रतिबंधों से बचकर तेल भेजने के लिए
•वेनेजुएला-अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद तेल व्यापार जारी रखने के लिए
इन जहाजों को अक्सर शैडो फ्लीट (Shadow Fleet) भी कहा जाता है.

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भारत के लिए क्या मायने?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है.
अगर वैश्विक स्तर पर डार्क ट्रांजिट बढ़ता है तो
•तेल की कीमतें और महंगाई प्रभावित हो सकती हैं
•रुपये पर दबाव बढ़ सकता है
•ऊर्जा सुरक्षा को लेकर रणनीति बदलनी पड़ सकती है

निष्कर्ष:
डार्क ट्रांजिट कोई नई चीज नहीं है, लेकिन भू राजनीतिक तनाव बढ़ने के साथ इसकी भूमिका भी बढ़ जाती है. दुनिया के समुद्रों में चल रही यह अदृश्य आवाजाही हमें याद दिलाती है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कई फैसले सिर्फ बाजार नहीं बल्कि राजनीति और रणनीति से भी तय होते हैं.

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