Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची बुधवार को राजनीतिक दलों के आपसी शक्ति प्रदर्शन और हुड़दंग की भेंट चढ़ गई. एक तरफ भारतीय जनता युवा मोरचा का जेपीएससी घेराव और दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की आक्रामक ललकार ने शहर की रफ्तार पर ऐसा ब्रेक लगाया कि पूरी राजधानी कराह उठी. नेताओं के सियासी ड्रामे और सड़कों पर कब्जा जमाने की होड़ में आम जनता पिसकर रह गई, जबकि मरीजों से भरी एंबुलेंस सायरन बजाती हुई जाम के समंदर में बेबस नजर आईं.
राजधानी की धड़कनें थमीं: प्रमुख मार्ग बने ट्रैफिक का दंश
राजनीतिक दलों के आमने-सामने आने और प्रदर्शन के कारण शहर के तमाम मुख्य मार्गों पर गाड़ियों का पहिया पूरी तरह थम गया. जेल रोड, मेन रोड, लालपुर चौक करमटोली चौक सहित तमाम महत्वपूर्ण इलाकों की तरफ जाने वाली हर सड़क पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं. स्थिति यह थी कि वाहन एक इंच भी आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे. हफ्तों के बीच बुधवार का दिन आम नागरिकों के लिए किसी सजा से कम साबित नहीं हुआ, जहां लोग घंटों जाम के झंझट में फंसे रहे.
कांग्रेस भवन के पास आमने-सामने आए सियासी धुरंधर
तनाव का मुख्य केंद्र कांग्रेस भवन के आसपास का इलाका रहा, जहां भाजपा के प्रदर्शनकारी और कांग्रेस कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए. दोनों पक्षों की ओर से नारेबाजी, शक्ति प्रदर्शन और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ ने माहौल को बेहद तनावपूर्ण बना दिया. सुरक्षा बलों और पुलिस प्रशासन को स्थिति संभालने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी, लेकिन तब तक पूरा मेन रोड और आसपास का वाणिज्यिक क्षेत्र राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका था.
जनता का फूटा गुस्सा, कहा, नेताओं ने बना दिया है नौटंकी
सड़कों पर घंटों जाम में फंसे आम जनों का सब्र आखिरकार जवाब दे गया. आम जनता का गुस्सा इन राजनीतिक दलों के खिलाफ फूट पड़ा. आम नागरिकों ने सीधे तौर पर कहा कि इन नेताओं और पार्टियों ने राजधानी की सड़कों को तमाशा और नौटंकी बना रखा है. दैनिक यात्रियों, ऑफिस जाने वाले कर्मचारियों और दुकानदारों का कहना था कि आखिर राजनेता अपनी रोटियां सेकने के लिए आम जनता की जिंदगी को दांव पर क्यों लगाते हैं? क्या जनता को ट्रैफिक के नरक में धकेल कर ही इन्हें अपनी ताकत का अहसास कराना होता है?
एंबुलेंस भी फंसी, जिंदगी और मौत के बीच जूझते रहे मरीज
इस पूरे सियासी हंगामे का सबसे डरावना और अमानवीय पहलू यह रहा कि कई आपातकालीन एंबुलेंस भी इस भीषण जाम के जाल में फंस गईं. सायरन की चीखती आवाज़ें और मरीजों की सांसों की डोर के बीच गाड़ियां जाम में जस की तस खड़ी रहीं. अस्पताल की ओर दौड़ रही एंबुलेंस के भीतर मरीज जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते रहे, लेकिन राजनीतिक दलों के आयोजनों और बेपरवाह भीड़ के आगे किसी की पुकार नहीं सुनी गई.
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