Giridih: झारखंड में आदिवासियों के अधिकार, सम्मान और विकास की बातें राजनीतिक मंचों से लेकर सरकारी दस्तावेजों तक लगातार दोहराई जाती हैं. राज्य का नेतृत्व भी आदिवासी समाज के हाथों में है. मुख्यमंत्री आदिवासी हैं, जबकि धनवार विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक भी आदिवासी समुदाय से हैं और तिसरी प्रखंड के ही निवासी हैं. लेकिन इन्हीं दावों के बीच तिसरी प्रखंड की थानसिंहडीह पंचायत के मंझिलाडीह गांव से सामने आई तस्वीर सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है. गांव के रहने वाले देवा सोरेन आज भी एक जर्जर मिट्टी के मकान में रहने को मजबूर हैं, जो लगातार हो रही बारिश के बीच किसी भी वक्त ढह सकता है. हर बारिश उनके लिए सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच की जंग बन जाती है. मजबूरी ऐसी है कि उनके पास रहने के लिए कोई दूसरा ठिकाना नहीं है.
आज भी सरकारी योजनाओं से वंचित है देवा सोरेन
ग्रामीणों के अनुसार, देवा सोरेन की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है. उनके पास न गैस चूल्हा है, न चारपाई, न बिस्तर और न ही जीवन की अन्य बुनियादी सुविधाएं हैं. आधे पेट भोजन और महज दो जोड़ी कपड़ों के सहारे किसी तरह जिंदगी गुजार रहे देवा सोरेन बारिश के दिनों में भी मिट्टी के फर्श पर रात बिताने को विवश हैं. उनका घर जगह-जगह से टूट चुका है और हर पल दुर्घटना का खतरा बना रहता है. ग्रामीणों ने बताया कि देवा सोरेन की पत्नी का निधन हो चुका है. पत्नी की मौत के बाद उनका जीवन और अधिक कठिन हो गया है. परिवार का सहारा छिन जाने के बाद वे पूरी तरह अकेले पड़ गए हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना या अबुआ आवास योजना जैसी किसी भी सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका. इतना ही नहीं, उनका नाम लाभुकों की सूची में भी शामिल नहीं है.
जर्जर घर में रहने के लिए मजबूर- पंचायत समिति सदस्य मनोज सोरेन
पंचायत समिति सदस्य मनोज सोरेन ने कहा कि देवा सोरेन को अब तक किसी भी आवास योजना का लाभ नहीं मिला है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गरीबों और आदिवासियों के उत्थान के लिए अनेक योजनाओं की घोषणा करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर जरूरतमंद लोग अब भी इन योजनाओं से वंचित हैं. उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा होता, तो देवा सोरेन को इस तरह जर्जर घर में रहने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में देवा सोरेन की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. इसके बावजूद अब तक न तो किसी अधिकारी ने उनकी स्थिति का गंभीरता से संज्ञान लिया और न ही उन्हें राहत दिलाने की दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई दी. ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते उन्हें सुरक्षित आवास उपलब्ध नहीं कराया गया तो बारिश के मौसम में कोई बड़ा हादसा भी हो सकता है.

यह मामला सिर्फ एक गरीब आदिवासी की बदहाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सरकारी दावों की भी परीक्षा है, जिनमें कहा जाता है कि विकास की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जा रहा है. जब राज्य का सर्वोच्च नेतृत्व और स्थानीय जनप्रतिनिधित्व दोनों आदिवासी समाज से होने का दावा करते हैं, तब भी यदि एक आदिवासी परिवार सुरक्षित छत, बिस्तर और सम्मानजनक जीवन जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है.
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