RANCHI: झारखंड आज एक गंभीर जल संकट की मुहाने पर खड़ा है. अप्रैल की शुरुआत के साथ ही राज्य के कई जिलों में पारा 43 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है. जैसे-जैसे सूरज की तपिश बढ़ रही है, पाताल का पानी और नीचे खिसकता जा रहा है. केंद्रीय जल बोर्ड और हालिया ‘स्टेट ऑफ एनवायरनमेंट रिपोर्ट 2026’ के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के करीब 40% ब्लॉक अब सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में आ गए हैं.
भीषण गर्मी और सूखते जलस्रोत
इस साल मानसून की 15% अधिक बारिश के बावजूद, पठारी संरचना के कारण पानी का संचयन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रहा है. अप्रैल के महीने में ही राज्य के डाल्टनगंज, जमशेदपुर और चाईबासा जैसे शहरों में भीषण लू का प्रकोप है. अत्यधिक गर्मी के कारण सतही जल स्रोत (तालाब और नदियां) तेजी से सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बोरिंग फेल होने की खबरें आम हो गई हैं.
- कहां कितनी गंभीर है स्थिति?
रांची और आसपास के क्षेत्र: राजधानी रांची में शहरीकरण और कंक्रीट के जंगलों के कारण वॉटर रिचार्ज पूरी तरह बाधित है. यहां कई इलाकों में जल स्तर पिछले एक दशक में 15 से 20 फीट तक नीचे गिरा है. रांची के शहरी ब्लॉक ‘सेमी-क्रिटिकल’ स्थिति में हैं. - पलामू संभाग (पलामू, गढ़वा, लातेहार): यह क्षेत्र राज्य का सबसे गर्म इलाका बना हुआ है. डाल्टनगंज में पारा 43 डिग्री के पार होने से भूगर्भ जल का दोहन सिंचाई के लिए बढ़ गया है, जिससे जल स्तर खतरनाक रूप से गिरा है.
- कोयलांचल (धनबाद, बोकारो): उद्योगों और खनन गतिविधियों के कारण यहां न केवल पानी नीचे जा रहा है, बल्कि प्रदूषित भी हो रहा है. धनबाद और बोकारो में जल स्तर में गिरावट के साथ-साथ भारी धातुओं की मौजूदगी चिंता का विषय है.
- लोहरदगा: लोहरदगा में पिछले 10 वर्षों में जल स्तर में 10-15 फीट की औसत गिरावट दर्ज की गई है.यहां पहले जो पानी 100-200 फीट पर मिल जाता था, अब उसके लिए 500-1000 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है.
- कोल्हान संभाग (पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम): जमशेदपुर और चाईबासा में तापमान 42.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने से घरेलू खपत में भारी उछाल आया है. यहां के शहरी इलाकों में जल स्तर प्रतिवर्ष औसतन 0.5 से 1 मीटर की दर से नीचे जा रहा है.
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ड्राई जोन की आहट
रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के कई जिले अब ड्राई जोन में तब्दील होने की कगार पर हैं. विशेष रूप से साहिबगंज और पाकुड़ जैसे गंगा तटीय क्षेत्रों में आर्सेनिक की समस्या और पलामू-गिरिडीह में फ्लोराइड की बढ़ती मात्रा ने संकट को और गहरा कर दिया है. जल स्तर नीचे जाने से इन रसायनों की सांद्रता बढ़ जाती है, जो सीधे स्वास्थ्य पर हमला कर रही है.
