Ranchi: झारखंड की राजनीति में एक बार फिर तीखे शब्दों के बाण चले हैं. इस बार भाजपा के पूर्व विधायक भानू प्रताप शाही ने पलामू की राजनीति के दिग्गज और राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर पर तंज कसा है. भानू प्रताप शाही ने एक ‘खुला पत्र’ लिखकर वित्त मंत्री के जमीर को झकझोरा है और उनसे सवाल किया है कि क्या उनका राजनीतिक कद केवल ‘वीआईपी सुरक्षा’ के इर्द-गिर्द सिमट गया है?

सुरक्षा लौटाने का नाटक या सत्ता का नया पैंतरा
भानू प्रताप शाही ने वित्त मंत्री की उस तस्वीर पर सवाल उठाया है, जिसमें वे सुरक्षा छोड़कर ‘इवनिंग वॉक’ करते दिख रहे हैं. शाही ने तंज कसते हुए लिखा, “जिस राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बदतर हो और जनता असुरक्षा के साए में हो, वहां आपका यह कदम क्या दर्शाता है? यह जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कवायद के अलावा और कुछ नहीं है.
नामधारी और ददई दुबे से सीखें
भानू प्रताप शाही ने वित्त मंत्री को उनके ही दौर के साथियों इंदर सिंह नामधारी और दिवंगत ददई दुबे की याद दिलाई. शाही ने याद दिलाया कि कैसे नामधारी जी ने सिद्धांतों के लिए सत्ता को लात मार दी थी और ददई दुबे ने जनहित के लिए मुख्यमंत्री से मोर्चा लिया था. उन्होंने लिखा, “किशोर भैया, पलामू की माटी ने कभी झुकना नहीं सीखा. सत्ता के सुख से ऊपर स्वाभिमान रहा है, लेकिन आज आप उसी सत्ता के गलियारे में खुद को खो चुके हैं.
भाषा का चीरहरण और कृष्ण की चुप्पी
पत्र का सबसे आक्रामक हिस्सा वह है, जिसमें शाही ने वित्त मंत्री को पलामू का कृष्ण कहकर संबोधित किया. उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि जब पलामू की अस्मिता और भोजपुरी-मगही भाषा के अस्तित्व पर संकट आया, तो किशोर भैया ‘मौन’ रहे. शाही ने लिखा कि “आपके नाम में राधा-कृष्ण समाहित हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि आज पलामू के ये ‘कृष्ण’ जनता के अपमान पर सुदर्शन चक्र उठाने के बजाय, अपनी सुरक्षा के मामूली सवाल पर सरकार से लड़ रहे हैं. क्या जनता के भविष्य से बड़ा आपकी निजी सुरक्षा का मुद्दा हो गया है?
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आत्ममंथन का आह्वान: अभी भी वक्त है
भानू प्रताप शाही ने वित्त मंत्री को सीधे तौर पर आत्ममंथन की सलाह दी है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि 46 वर्षों का संसदीय अनुभव सत्ता के भोग के लिए नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनने के लिए होता है. शाही ने अंत में चेतावनी भरे अंदाज में लिखा कि पलामू की तासीर ‘समझौतावादी’ नहीं, ‘संघर्षवादी’ है. अब वक्त आ गया है कि वित्त मंत्री तय करें कि वे जनता के साथ खड़े हैं या कुर्सी के मोह में उलझे रहेंगे.


