Ranchi: झारखंड में मनरेगा और जल जीवन के कार्यान्वयन में फर्जीवाड़ा हुआ है. इसका खुलासा कैग (CAG Report) की रिपोर्ट में हुआ है. वित्त मंत्री ने मंगलवार को सदन में कैग की रिपोर्ट पेश की. रिपोर्ट बताती है कि किस तरह योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन धरातल पर हालात बद से बदतर हैं. एक तरफ जहां मनरेगा मजदूरों की गाढ़ी कमाई और मजदूरी के करोड़ों रुपये सालों से बकाया हैं, वहीं दूसरी तरफ जल जीवन मिशन के तहत करोड़ों खर्च करने के बाद भी लोगों के नलों से साफ पानी की जगह सिर्फ निराशा टपक रही है.
कागजी योजनाएं, बकाया मजदूरी और अधूरा सच
राज्य के ग्रामीण इलाकों में जीवन रेखा कही जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) झारखंड में प्रशासनिक लापरवाही की गिरफ्त में है. 2019-24 की अवधि के लिए की गई लेखापरीक्षा में जो खुलासे हुए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं. नियमों के मुताबिक श्रम बजट तैयार करने के लिए बॉटम-अप दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए था और घर-घर जाकर काम की मांग का आकलन होना चाहिए था. लेकिन विभाग ने इन सब को दरकिनार कर केवल कागजी और बजटीय आधार पर आंकड़े तैयार किए. न तो जिला परिप्रेक्ष्य योजनाएं बनीं और न ही ग्राम पंचायत स्तर पर जॉब कार्ड जारी करने और उन्हें अपडेट करने में पारदर्शिता बरती गई.
भुगतान में भारी विलंब और करोड़ों की मजदूरी बकाया
राज्य सरकार द्वारा इस योजना के लिए 40 से 55 दिनों की भारी देरी से धनराशि जारी की गई. हालात यह हैं कि मार्च 2025 तक, वर्ष 2019-20 से 2023-24 की अवधि के लिए अकुशल श्रमिकों के 321.84 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान बकाया पड़ा हुआ है. समय पर मजदूरी न मिलने के कारण गरीब मजदूरों को भारी आर्थिक संकट और भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे योजना का मूल उद्देश्य ही तार-तार हो गया है.
अधूरे पड़े कार्य और फर्जीवाड़ा
27 प्रतिशत ही काम पूरे: 2019-24 के दौरान प्रस्तावित कुल 1,02,68,484 कार्यों में से मात्र 27,96,044 (27 प्रतिशत) कार्य ही पूरे हो सके.
अधूरी परियोजनाएं: मार्च 2024 तक 2,633 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी 50,21,492 (49 प्रतिशत) कार्य अधूरे लटके रहे, जबकि 24 प्रतिशत कार्य तो शुरू ही नहीं किए गए.
अनियमित खर्च: तीन नमूना-जांच वाले जिलों में 32.62 लाख रुपये का व्यय पुराने वाहनों के रखरखाव और अधिकारियों के वेतन जैसी अस्वीकार्य मदों पर कर दिया गया.
बिना माप के भुगतान: कई मामलों में ‘मापी पुस्तिका’ और ‘मस्टर रोल’ का रखरखाव किए बिना ही धड़ल्ले से भुगतान जारी कर दिया गया, जिससे बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ियों की पुष्टि होती है.
जल जीवन मिशन: करोड़ों खर्च, पर नल सूखे और पानी गंदा
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ झारखंड में कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का शिकार हो चुकी है. अगस्त 2019 से शुरू हुई इस योजना का लक्ष्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन के माध्यम से सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना था, लेकिन हकीकत दावों से कोसों दूर है.
• धीमी गति: राज्य सरकार ने 24,360.91 करोड़ की लागत से योजनाएं तो मंजूर कीं, लेकिन फंड की कमी के कारण दिसंबर 2024 तक केवल 28 प्रतिशत योजनाएं ही पूरी हो पाईं.
• आधा-अधुरा आच्छादन: मार्च 2025 तक झारखंड में 55 प्रतिशत परिवारों को ही FHTC मिल पाया, जो राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत से काफी कम है. राज्य के करीब 6,958 गांवों में आज भी एक भी नल कनेक्शन नहीं है.
• निर्धारित मात्रा से कम पानी: जांच में सामने आया कि कई सिंगल विलेज योजनाओं में निर्धारित न्यूनतम 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मुकाबले केवल 37 प्रतिशत पानी ही आपूर्ति किया जा रहा है.
• असंतोषजनक सेवाएं: 19 से 40 प्रतिशत लाभार्थी अनियमित, अपर्याप्त और गंदे पानी की आपूर्ति से बेहद परेशान और असंतुष्ट नजर आए.
टेंडर में मिलीभगत और संवेदकों को अनुचित वित्तीय लाभ
लेखापरीक्षा में खुलासा हुआ कि ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को ताक पर रखा गया. निविदा जमा करने के लिए मात्र 5 से 22 दिन का समय दिया गया, ताकि प्रतिस्पर्धा सीमित हो सके. एक ही संवेदक को बिना पर्याप्त क्षमता के कई काम सौंप दिए गए. इतना ही नहीं, संवेदकों को 27.13 करोड़ रुपये की अनुचित वित्तीय सहायता दी गई, जिसमें अस्वीकार्य भुगतान, मोबिलाइजेशन अग्रिम की वसूली न होना और अधिक भुगतान शामिल हैं.
लैब और जल गुणवत्ता जांच की लचर व्यवस्था
ग्रामीणों को शुद्ध पानी मिल रहा है या नहीं, इसकी जांच के लिए बने जिला प्रयोगशालाओं के पास न तो पर्याप्त उपकरण थे और न ही NABL की मान्यता. अधिकांश प्रयोगशालाओं में सूक्ष्मजीव विज्ञानी तक तैनात नहीं थे और रासायनिक आपूर्ति ठप होने के कारण पानी के नमूनों की सही से जांच ही नहीं हो पाई.
फैक्ट फाइल
• मनरेगा का हाल बेहाल: झारखंड में मनरेगा मजदूरों के 321.84 करोड़ रुपये की मजदूरी मार्च 2025 तक बकाया, भुखमरी के कगार पर पहुंचे मजदूर.
• अधूरे पड़े विकास कार्य: मनरेगा के तहत 2,633 करोड़ खर्च होने के बाद भी 49 प्रतिशत कार्य अधूरे पड़े हैं और 24 प्रतिशत कार्य शुरू तक नहीं हुए.
• अनियमित खर्च और भ्रष्टाचार: मनरेगा में 32.62 लाख रुपये का अनियमित खर्च और जल जीवन मिशन में संवेदकों को 27.13 करोड़ रुपये का अवैध वित्तीय लाभ पहुंचाया गया.
• जल जीवन मिशन की विफलता: करोड़ों खर्च के बावजूद झारखंड में FHTC आच्छादन मात्र 55 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है.
• शिकायत निवारण तंत्र फेल: दोनों ही योजनाओं में सतर्कता प्रकोष्ठों का अभाव, सोशल ऑडिट की अनदेखी और शिकायतों के समय पर निपटारे का कोई ठोस तंत्र नहीं मिला.
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