Ranchi: झारखंड के चार प्रमुख विभागों वाणिज्य कर, परिवहन, उत्पाद एवं मद्य निषेध और राजस्व निबंधन की कार्यप्रणाली इतनी लचर पाई गई है कि सरकारी खजाने को 4,300 करोड़ से अधिक का फटका लगा है. इसका खुलासा मंगलवार को विधानसभा में पेश किए गए रिर्पोट में हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक प्रतिवेदन में शामिल अनियमितताओं का कुल वित्तीय प्रभाव 4,324.44 करोड़ है. सरकार और संबंधित विभागों ने 859.43 करोड़ की गड़बड़ियों को स्वीकार किया है, लेकिन नाममात्र की केवल 23.56 करोड़ की ही वसूली हो पाई है. जीएसटी पोर्टल और ई-वे बिल प्रणालियों में तकनीकी खामियों और निगरानी के अभाव से अरबों का चूना लगा है. एक लाख से अधिक बिना टैक्स वाले वाहन सड़कों पर दौड़ते रहे और विभाग सोता रहा. आईटीआर और जीएसटी डेटा के बीच तिर्यक जांच न होने के कारण हजारों अपंजीकृत कारोबारी मजे ले रहे हैं.
तकनीक के नाम पर सिस्टम फेल
जीएसटी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के दावे तब खोखले साबित हो गए जब कैग ने पाया कि जीएसटीएन और ई-वे बिल पोर्टलों के बीच कोई मजबूत आपसी संबंध ही नहीं है. कई शातिर करदाताओं ने शून्य रिटर्न दाखिल किया, लेकिन चुपचाप लाखों-करोडों के सामान का ई-वे बिल सृजित कर माल खपा दिया. धनबाद और जमशेदपुर अंचलों में ऐसे कई मामले पकड़े गए. जिन कंपनियों के जीएसटी पंजीकरण पहले ही रद्द हो चुके थे, उनके पैन पर नए पंजीकरण धड़ल्ले से बनते रहे और पुरानी बकाया देयताएं फाइलों में दबी रहीं. एक ही इनवॉइस या बिल पर कई बार ई-वे बिल जेनरेट कर करोड़ों का हेरफेर किया गया, जिसे रोकने के लिए पोर्टल पर कोई पुख्ता सत्यापन नियंत्रण मौजूद नहीं था.
आईटीआर और जीएसटी डेटा में भारी अंतर
आयकर विभाग और वाणिज्य कर विभाग के बीच डेटा साझा करने का कोई ठोस तंत्र न होने के कारण टैक्स चोरी के बड़े मामलों का खुलासा हुआ है. कई कारोबारियों ने अपने आईटीआर में करोड़ों रुपये की बिक्री दिखाई, लेकिन जीएसटी के दायरे में कभी आए ही नहीं. कोयला परिवहन, मरम्मत और रखरखाव जैसी सेवाओं में 12% से 18% तक का जीएसटी बनता था, लेकिन मिलीभगत या अज्ञानता के कारण 5% और 12% की निचली दरों पर कर चुकाकर सरकार को भारी चपत लगाई गई. जो वेंडर कर छूट के पात्र ही नहीं थे, उन्होंने भी धारा 51 के तहत गलत तरीके से छूट का लाभ उठाया और भारी-भरकम टैक्स बचा लिया.
परिवहन विभाग: सड़कों पर दौड़ते अनफिट और टैक्स चोर वाहन
परिवहन विभाग की सुस्ती का आलम यह है कि राज्य में नियमों को ताक पर रखकर हजारों वाहन बिना टैक्स चुकाए धड़ल्ले से फर्राटा भर रहे हैं. राज्यभर में 1.24 लाख से अधिक परिवहन वाहनों की कर वैधता समाप्त हो चुकी थी. इनमें से हजारों चूककर्ता मालिकों से मोटर वाहन कर और हरित कर के रूप में 111.24 करोड़ की भारी-भरकम राशि वसूल ही नहीं की गई. एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर में व्यावसायिक नियमावलियों का सही मानचित्रण न होने के कारण हजारों पुराने वाहनों से हरित कर का उद्ग्रहण शून्य रहा. बिना पर्याप्त अनुश्रवण के निर्गत किए गए हजारों अस्थायी पंजीकरणों के कारण भी राजस्व का भारी नुकसान हुआ.
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उत्पाद एवं भू-राजस्व विभागों की मनमानी
उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग के अधिकारियों की लचर मॉनिटरिंग के चलते कंपनियों के पास पड़े भारतीय निर्मित विदेशी शराब के शुरुआती स्टॉक पर अंतर उत्पाद शुल्क की वसूली नहीं की गई. न्यूनतम प्रत्याभूत शुल्क और परिवहन शुल्क के विलंब पर लगने वाले करोड़ों रुपये के जुर्माने की फाइलें भी ठंडे बस्ते में डाल दी गईं.
स्थापना शुल्क में कटौती
राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग ने भूमि अधिग्रहण योजनाओं में मुआवजे की राशि का निर्धारित 5 प्रतिशत लेने के बजाय केवल 2.5 प्रतिशत की दर से ही स्थापना शुल्क वसूला, जिससे सीधे तौर पर 1.28 करोड़ का नुकसान हुआ.
कैग की सख्त सिफारिशें
• पोर्टलों का एकीकरण: जीएसटीएन और एनआईसी के पोर्टलों को आपस में जोड़ा जाए ताकि शून्य रिटर्न दाखिल करने वालों या रद्द पंजीयन वालों पर तुरंत ऑटो-अलर्ट मिल सके.
• क्रॉस-वेरिफ़िकेशन तंत्र: आयकर विभाग और वाणिज्य कर विभाग के आंकड़ों की नियमित तिर्यक जांच के लिए एक ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित किया जाए.
• सख्त रिकवरी ड्राइव: जिन मामलों में डिमांड नोटिस जारी हो चुके हैं, उनके खिलाफ समय सीमा के भीतर सख्त कानूनी और वसूली की कार्रवाई शुरू की जाए.
• विशेष जांच दल: परिवहन और वाणिज्य कर से जुड़े डेटा विश्लेषणात्मक प्रतिवेदनों की जमीनी हकीकत जांचने के लिए समर्पित विशेष टीमों का गठन किया जाए.
