Pakur: कहते हैं कि यदि भक्ति और संकल्प मजबूत हो तो कोई भी कार्य असंभव नहीं होता. इस बात को पाकुड़ के चर्चित लाल बाबा ने सच साबित कर दिखाया है. पिछले 15 वर्षों से अपनी अनोखी साधना और जनसेवा के लिए चर्चा में रहने वाले लाल बाबा ने समाज के सहयोग और अटूट विश्वास के दम पर एक भव्य धार्मिक स्थल का निर्माण कर नई मिसाल पेश की है.
लाल बाबा बताते हैं कि उनके पूर्वज लंबे समय से तांत्रिक विद्या और पशु बलि जैसी परंपराओं से जुड़े थे. उनके घर में काली पूजा और तांत्रिक अनुष्ठान आम बात थी. लेकिन समय के साथ उनके मन में इस परंपरा को लेकर बदलाव आया. उन्होंने तय किया कि वे इस मार्ग को छोड़कर सात्विक भक्ति के रास्ते पर चलेंगे. इसके बाद उन्होंने गुरु महाराज से दीक्षा ली, कंठधारी बने और पूरी तरह शाकाहार को अपनाया.

भिक्षा के पैसों से रखी मंदिर की नींव
लाल बाबा का संकल्प था कि मंदिर निर्माण केवल भिक्षा से मिले धन से ही किया जाएगा. उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रण लिया था कि जो भी निर्माण करेंगे, वह लोगों से मिले छोटे-छोटे सहयोग से ही होगा. कोई एक रुपया देता था, कोई दो रुपये तो कोई पांच रुपये दान करता था. इन्हीं छोटे योगदानों ने धीरे-धीरे एक बड़े सपने को आकार दिया.
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12 फीट गहरे पोखर से बना आस्था का केंद्र
मंदिर निर्माण का रास्ता आसान नहीं था. जहां आज भव्य मंदिर दिखाई देता है, वहां पहले लगभग 12 फीट गहरा पोखर था. पहले उस जगह को मिट्टी से भरवाया गया और मजबूत पिलरिंग के साथ मंदिर की नींव रखी गई. शुरुआत में लाल बाबा ने वहां भगवान हनुमान का छोटा मंदिर बनवाया. बाद में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी तो महादेव और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित की गईं.
अब श्रद्धालुओं की आस्था का बन चुका है केंद्र
आज लाल बाबा का यह मंदिर केवल पाकुड़ ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है. लाल बाबा का कहना है कि उनका उद्देश्य समाज में सात्विकता फैलाना और लोगों को पशु बलि जैसी कुरीतियों से दूर कर शुद्ध भक्ति से जोड़ना है.
लंबी दाढ़ी, लाल वस्त्र और गले में रुद्राक्ष की माला धारण किए लाल बाबा आज भी उसी सादगी के साथ अपने संकल्प को आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी कहानी यह संदेश देती है कि दृढ़ विश्वास और निस्वार्थ संकल्प के सामने बड़ी से बड़ी बाधा भी छोटी पड़ जाती है.
