News Wave Desk:भारत में नवजात बच्चे से लेकर दुल्हन तक, सबकी आंखों में काजल जरूर दिखता है. इसे सिर्फ मेकअप का हिस्सा समझना गलत होगा. आयुर्वेदाचार्य और नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार, काजल लगाने की परंपरा के पीछे गहरे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं.
नजर उतारने से लेकर शनि दोष तक: धार्मिक मान्यता

भारत में मान्यता है कि काला रंग बुरी नजर और नेगेटिव एनर्जी को सोख लेता है. इसलिए बच्चों की आंखों में या माथे पर काजल का टीका लगाया जाता है. सोलह श्रृंगार में शामिल काजल को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. ज्योतिष के अनुसार, काला रंग शनि ग्रह से जुड़ा है और काजल लगाने से शनि-राहु के बुरे प्रभाव से बचाव होता है.

घी-कपूर वाला असली काजल था आंखों का टॉनिक

आयुर्वेद के अनुसार, पुराने समय में काजल घी, कपूर, बादाम और त्रिफला को दीये में जलाकर बनाया जाता था. इस हर्बल काजल के कई फायदे है
ठंडक देता था: कपूर और घी आंखों की जलन, थकान दूर करते थे.
प्राकृतिक सनग्लास: काजल की परत तेज धूप, धूल और धुएं को सीधे आंखों में जाने से रोकती थी.
इंफेक्शन से बचाव: त्रिफला और नीम के गुणों से ‘आंख आना’ जैसी समस्याएं कम होती थीं.
रोशनी बढ़ाए: माना जाता था कि सुरमा लगाने से आंखों की नसें मजबूत होकर नजर तेज होती है.
सुंदरता के साथ-साथ सेहत भी
काजल आंखों को बड़ा और आकर्षक दिखाता है, लेकिन इसके साथ ही आंसू की नली साफ रखकर आंखों को ड्राई होने से भी बचाता है.
सावधान: आज का केमिकल काजल हो सकता है खतरनाक

मार्केट में मिलने वाले काजल में लेड, पैराबेन्स होते हैं. इन्हें रोज वॉटरलाइन पर लगाने से एलर्जी, ड्राई आई और कॉर्नियल डैमेज हो सकता है. वे सलाह देती हैं कि केमिकल-फ्री, आयुर्वेदिक काजल ही चुनें और सोने से पहले जरूर हटा दें. नवजात बच्चों पर काजल लगाने से पहले डॉक्टर की सलाह लें.
परंपरा और विज्ञान का यह मेल काजल को सिर्फ श्रृंगार नहीं, आंखों का सुरक्षा कवच भी बनाता है.
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