Ranchi: कांग्रेस द्वारा आदिवासी समागम के बहिष्कार की अपील पर पलटवार करते हुए पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने कहा कि जब आदिवासी समाज अपनी रूढ़िजन्य परंपराओं, सभ्यता और संस्कृति को बचाने के लिए जागरूक हो रहा है, तो कांग्रेस के पेट में दर्द क्यों हो रहा है? उन्होंने सचेत किया कि अगर भगवान बिरसा मुंडा के दिखाए रास्ते पर चलकर आज अपनी संस्कृति नहीं बचाई गई, तो भविष्य में जाहेरस्थानों, सरना स्थलों और देशाउली में पूजा करने वाला कोई नहीं बचेगा. बताते चलें कि झारखंड सहित देशभर के आदिवासियों का रविवार को दिल्ली में एक ऐतिहासिक महाजुटान होने जा रहा है. जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित इस जनजाति सांस्कृतिक समागम को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह संबोधित करेंगे. इस महाधिवेशन में शामिल होने के लिए झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन शनिवार को रांची से दिल्ली के लिए रवाना हुए.

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कांग्रेस हमेशा से आदिवासी विरोधी रही है
रांची एयरपोर्ट पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा से आदिवासी विरोधी रही है. झारखंड आंदोलन के दौरान आदिवासियों और मूलवासियों पर लाठियां और गोलियां चलवाने वाली कांग्रेस अगर सच में आदिवासियों की हितैषी होती, तो 1961 की जनगणना से आदिवासियों का परंपरागत धर्म कोड कभी नहीं हटाती.
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कार्तिक उरांव के डिलिस्टिंग प्रस्ताव का दिया हवाला
पूर्व सीएम ने इतिहास की याद दिलाते हुए कहा कि 1967 में प्रखर आदिवासी नेता बाबा कार्तिक उरांव ने संसद में डिलिस्टिंग का प्रस्ताव रखा था. इसके तहत धर्म बदल चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति के आरक्षण और सुविधाओं से बाहर करने की मांग की गई थी. 1969 में संयुक्त संसदीय समिति ने भी इसकी सिफारिश की थी. चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि 348 सांसदों के हस्ताक्षर के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने करोड़ों आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़े इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया.
