Giridih: झारखंड सरकार आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के दावे करती है, लेकिन गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड की धरगुल्ली पंचायत के कालीचट्टान गांव स्थित बासोटांड़ आदिवासी टोले की स्थिति इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है. महज 100 मीटर की दूरी पर संचालित पत्थर खदान में होने वाली हैवी ब्लास्टिंग से करीब 20 आदिवासी परिवारों में दहशत का माहौल है. ग्रामीणों का आरोप है कि लगातार हो रहे विस्फोटों से घरों की दीवारों में दरारें पड़ रही हैं और पत्थरों के टुकड़े घरों तक पहुंच रहे हैं. ग्रामीणों के अनुसार, खदान करीब 2.65 एकड़ क्षेत्र में संचालित है. वर्ष 2022 में खनन की अनुमति मिलने के बाद ग्रामीणों ने संभावित खतरे को देखते हुए विरोध शुरू किया था. विरोध के कारण करीब तीन वर्षों तक खनन कार्य बंद रहा, लेकिन पिछले करीब छह महीने से फिर खनन शुरू हो गया है. ग्रामीणों का दावा है कि प्रतिदिन करीब 30 हाइवा पत्थर निकाला जा रहा है.
प्रधानमंत्री आवास भी नहीं बचा, दीवारों में आई दरारें
ग्रामीणों के अनुसार, हैवी ब्लास्टिंग का असर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए पक्के मकानों पर भी दिखाई दे रहा है. लालजीत मांझी, मुदिया देवी, बसंती देवी, मुंदरी देवी, तुलसी मांझी और एजोरमुनी देवी के घरों में दरारें आने का दावा किया गया है. वहीं तुलसी मांझी का पुराना मिट्टी का मकान पूरी तरह ढह चुका है. ग्रामीणों का कहना है कि मजदूरी कर किसी तरह उन्होंने पक्के मकान बनवाए थे, लेकिन खदान की ब्लास्टिंग ने उनके आशियाने की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर दिया है.
पहले खदान के कारण उजड़े, अब फिर विस्थापन का डर
बासोटांड़ निवासी छोटन मुर्मू ने बताया कि करीब दो दशक पहले उनका पुराना गांव भी पत्थर खदान की चपेट में आ गया था. खदान शुरू होने के बाद ग्रामीणों को अपना पुराना घर छोड़कर रैयती जमीन पर बासोटांड़ में बसना पड़ा था. अब उसी इलाके में दोबारा खनन शुरू होने से ग्रामीणों को फिर विस्थापन का डर सता रहा है. छोटन मुर्मू का कहना है कि खदान के दूसरी तरफ उनकी जमीन है, लेकिन लगातार ब्लास्टिंग के कारण वहां रहना भी सुरक्षित नहीं लगता. ऐसे में ग्रामीणों के सामने सवाल है कि वे आखिर जाएं तो जाएं कहां.
स्थानीय विधायक से भी ग्रामीणों में नाराजगी
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि खदान संचालन का विरोध करने वाले आदिवासी परिवारों को गांव छोड़कर चले जाने की धमकी भी दी गई है. ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने सुरक्षा और खदान बंद कराने को लेकर पुलिस और प्रशासन से शिकायत की, लेकिन अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ. ग्रामीणों ने खदान के आसपास ओवरबर्डन डंप करने और मिट्टी का मेड़ बनाने की बात भी कही है. उनका दावा है कि खदान की गतिविधियों से आसपास के जलस्रोत प्रभावित हो रहे हैं और चापाकल का जलस्तर भी नीचे चला गया है. ग्रामीणों में स्थानीय विधायक नागेंद्र महतो के प्रति भी नाराजगी है. उनका कहना है कि इतने गंभीर मामले के बावजूद अब तक विधायक गांव पहुंचकर उनकी स्थिति देखने नहीं आए. ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब घरों में दरारें पड़ रही हों, ब्लास्टिंग से जान का खतरा हो और विस्थापन की आशंका बनी हो, तब उनकी सुध कौन लेगा.
सीओ बोले, जांच के बाद होगी कार्रवाई
मामले में बगोदर सीओ प्रवीण कुमार ने कहा कि हैवी ब्लास्टिंग से घरों में दरार पड़ने की सूचना मिली है. जल्द ही मामले की जांच कराई जाएगी. उन्होंने कहा कि खदानों में ब्लास्टिंग के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना जरूरी है. यदि खदान संचालक नियमों का उल्लंघन करता पाया गया तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. अब सवाल यह है कि जांच कब होगी और कार्रवाई कब. तीन वर्षों तक विरोध के बावजूद दोबारा शुरू हुए खनन के बीच बासोटांड़ के आदिवासी परिवार अपने घरों की दरारों से ज्यादा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. प्रशासन की जांच और कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि खनन के दौरान नियमों का पालन हो रहा है या ग्रामीणों की सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है.

