Hazaribagh: कभी घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और वन्य जीवों से समृद्ध हजारीबाग को बाघों की धरती कहा जाता था. यहां के जंगलों में बाघों की दहाड़ गूंजती थी और दूर-दूर से लोग इस क्षेत्र को बाघों के प्राकृतिक आवास के रूप में जानते थे. लेकिन वक्त के साथ यह दहाड़ इतिहास बन गई. आज अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर जब दुनिया बाघों के संरक्षण की बात कर रही है, तब हजारीबाग का इतिहास उन दर्दनाक घटनाओं की याद दिलाता है, जिनके कारण यहां से बाघ लगभग गायब हो गए.
‘बाग’ में छिपी है ‘बाघ’ की कहानी
इतिहासकारों का मानना है कि हजारीबाग का नाम केवल हजार बाग-बगीचों से ही नहीं, बल्कि यहां बड़ी संख्या में पाए जाने वाले बाघों से भी जुड़ा रहा है. अंग्रेजों के दौर के कई दस्तावेज बताते हैं कि छोटानागपुर का यह इलाका बाघों के सबसे महत्वपूर्ण आवासों में शामिल था.
1773 से शुरू होती है दर्ज इतिहास की कहानी
वर्ष 1773 से अंग्रेज अधिकारियों और यात्रियों ने अपने अभिलेखों में हजारीबाग के जंगलों में बड़ी संख्या में बाघों की मौजूदगी का उल्लेख किया. उस समय जंगल इतने घने थे कि बाघों का दिखना आम बात थी. ग्रामीणों और यात्रियों के लिए जंगल पार करना हमेशा जोखिम भरा माना जाता था.
ब्रिटिश शासन ने शुरू किया खूनी अभियान
ब्रिटिश शासन के दौरान बाघों को खतरनाक जानवर घोषित कर उनके शिकार को बढ़ावा दिया गया. अंग्रेज अधिकारियों, सैन्य अफसरों और शिकार के शौकीनों के लिए बाघ मारना शान और बहादुरी का प्रतीक बन गया. कई स्थानों पर बाघ मारने वालों को इनाम दिया जाता था. परिणाम यह हुआ कि हजारों बाघों का बेरहमी से शिकार किया गया.
जब प्रशासन असहाय हुआ, तब राजाओं ने संभाली कमान
रिपोर्ट के अनुसार कई बार बाघों के आतंक से परेशान ब्रिटिश प्रशासन स्थानीय राजाओं और जमींदारों की मदद लेता था. विशेष शिकार अभियान चलाए जाते थे, जिनमें हाथियों, घुड़सवारों, बंदूकधारियों और मचानों का इस्तेमाल कर बाघों को घेरकर मार दिया जाता था. उस दौर में इसे वीरता का कार्य माना जाता था.
आज भी मौजूद है बाघों के शिकार का गवाह ‘टाइगर ट्रैप’
हजारीबाग अभयारण्य क्षेत्र में आज भी एक ऐतिहासिक ‘टाइगर ट्रैप’ मौजूद है. यह गहरा गड्ढा विशेष रूप से बाघों को फंसाने के लिए बनाया गया था. बाघ जैसे ही उसमें गिरता था, शिकारी उसे मार देते थे. यह संरचना आज भी उस अमानवीय शिकार परंपरा की मूक गवाह बनी हुई है.
50 वर्षों में खत्म हो गई हजारों बाघों की जिंदगी
इतिहास बताता है कि वर्ष 1875 से 1925 के बीच भारत में 80 हजार से अधिक बाघों का शिकार किया गया. इसका सबसे बड़ा असर उन क्षेत्रों पर पड़ा जहां कभी बाघों की भरमार थी. हजारीबाग भी उन्हीं इलाकों में शामिल था.
जंगल उजड़े, शिकार घटा और बाघ भी गायब होते गए
स्वतंत्रता के बाद अवैध शिकार पर कुछ हद तक रोक लगी, लेकिन जंगलों की कटाई, खनन, सड़क निर्माण, बढ़ती आबादी और वन क्षेत्र के सिकुड़ने से बाघों का प्राकृतिक आवास लगातार नष्ट होता गया. शिकार बनने वाले जानवरों की संख्या कम हुई और बाघ धीरे-धीरे जंगल छोड़ने लगे.
1973 में शुरू हुआ ‘प्रोजेक्ट टाइगर’
बाघों की तेजी से घटती संख्या को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की. इस योजना के तहत बाघों और उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए विशेष टाइगर रिजर्व बनाए गए. अवैध शिकार रोकने, वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाने और जंगलों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया.
अब तकनीक कर रही है बाघों की निगरानी
आज कैमरा ट्रैप, जीपीएस ट्रैकिंग, एम-स्ट्राइप्स, ड्रोन सर्विलांस और आधुनिक वन प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से बाघों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है. इससे उनके संरक्षण को नई दिशा मिली है.
29 जुलाई: संरक्षण का संकल्प लेने का दिन
हर वर्ष 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य केवल बाघों का महत्व बताना नहीं, बल्कि लोगों को यह याद दिलाना भी है कि यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे, तभी बाघ और पूरा पर्यावरण सुरक्षित रहेगा.हजारीबाग का इतिहास बताता है कि कभी यहां बाघों का साम्राज्य था. लेकिन अंधाधुंध शिकार, जंगलों का विनाश और मानवीय हस्तक्षेप ने इस विरासत को लगभग समाप्त कर दिया. आज जरूरत है कि अतीत की गलतियों से सीख लेकर जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा की जाए. क्योंकि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि स्वस्थ जंगल और संतुलित पर्यावरण का सबसे बड़ा प्रतीक है. यही संदेश अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस हमें देता है.
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