हजारीबाग: त्योहार से पहले शराब बंदी की सूचना…आखिर किसके हित में? बकरीद से पहले शराब दुकानों पर नोटिस, उठ रहे कई सवाल

Hazaribagh: बकरीद जैसे संवेदनशील पर्व को लेकर प्रशासन द्वारा शराब दुकानों को बंद रखने का निर्णय लेना नई बात नहीं है. विधि-व्यवस्था...

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सांकेतिक तस्वीर

Hazaribagh: बकरीद जैसे संवेदनशील पर्व को लेकर प्रशासन द्वारा शराब दुकानों को बंद रखने का निर्णय लेना नई बात नहीं है. विधि-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए ऐसे कदम जरूरी भी माने जाते हैं. लेकिन इस बार शराब दुकान के बाहर टंगे एक नोटिस ने पूरे सिस्टम की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. दुकान के बाहर साफ लिखा है, 28:05:2026 गुरुवार को दुकान बंद रहेगा.” यानी एक दिन पहले ही ग्राहकों को बता दिया गया कि अगले दिन शराब नहीं मिलेगी. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या ऐसी पूर्व सूचना वास्तव में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद करती है या फिर उल्टा लोगों को “पहले से स्टॉक” करने का अवसर देती है?

“आज ही कल का इंतजाम कर लो” वाला संदेश?

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी रामनवमी, बकरीद, मुहर्रम या अन्य संवेदनशील पर्व आते हैं, उससे पहले शराब दुकानों के बाहर इसी तरह की सूचना चस्पा कर दी जाती है. इसका सीधा असर यह होता है कि लोग एक दिन पहले ज्यादा मात्रा में शराब खरीद लेते हैं. यानी जिस उद्देश्य से दुकान बंद की जाती है कि लोग शराब पीकर माहौल खराब न करें वही उद्देश्य पहले दिन की भारी बिक्री से कमजोर पड़ जाता है.

अगर नियंत्रण ही मकसद है, तो अचानक बंदी क्यों नहीं?

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों का सवाल है कि अगर प्रशासन सचमुच पर्व के दौरान शराब सेवन रोकना चाहता है, तो फिर अचानक बंदी क्यों नहीं की जाती? क्या वजह है कि पहले से सूचना देकर अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को “स्टॉक” करने का मौका दिया जाता है? क्या यह प्रक्रिया पूरी तरह विधिसम्मत है? और क्या इससे संवेदनशील मौकों पर शराब की उपलब्धता वास्तव में कम हो पाती है?

राजस्व बनाम सामाजिक जिम्मेदारी

एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या सरकार और उत्पाद विभाग कहीं न कहीं राजस्व संतुलन भी साधते हैं? क्योंकि एक दिन पहले अचानक बिक्री बढ़ जाती है. ऐसे में दुकान बंद रहने के बावजूद राजस्व का नुकसान नहीं होता, जबकि प्रशासनिक औपचारिकता भी पूरी हो जाती है. यानी दुकान बंद, लेकिन शराब उपलब्ध.

सामाजिक संगठनों ने उठाई पारदर्शिता की मांग

कई लोगों का कहना है कि पर्वों के दौरान यदि सचमुच शांति और संयम बनाए रखना उद्देश्य है, तो शराब बिक्री पर नीति अधिक प्रभावी और पारदर्शी होनी चाहिए। अचानक बंदी, सीमित बिक्री या निगरानी जैसी व्यवस्था अधिक कारगर साबित हो सकती है.

व्यवस्था पर उठते सवाल

त्योहारों के दौरान शराब दुकान बंद रखने का फैसला स्वागतयोग्य माना जा सकता है, लेकिन उससे पहले खुलेआम “कल बंद रहेगा” का बोर्ड क्या वास्तव में प्रशासनिक समझदारी है? या फिर यह सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई है? अब देखना यह होगा कि उत्पाद विभाग और प्रशासन इस व्यवस्था पर भविष्य में कोई पुनर्विचार करता है या नहीं.

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