Hazaribagh: ऐतिहासिक सेंट कोलंबस कॉलेज, जिसकी स्थापना वर्ष 1904 में हुई थी, अपनी समृद्ध शैक्षणिक, साहित्यिक और बौद्धिक परंपराओं के कारण देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है. इस कॉलेज का उर्दू विभाग शुरू से ही इसकी गौरवशाली पहचान का अभिन्न हिस्सा रहा है. विभाग के विकास और प्रतिष्ठा में प्रोफेसर मुस्लिम अजीमाबादी, प्रोफेसर शान अहमद सिद्दीकी, प्रोफेसर गुलाम शरफुद्दीन मलिक, डॉ. जमाल अहमद तथा अन्य विद्वान शिक्षकों का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा. इसी विभाग से शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक छात्र आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं देकर संस्थान का नाम रोशन कर रहे हैं.
छात्रों के आंदोलन के कारण फिर से शुरू हुआ नामांकन
हालांकि, कुछ समय पूर्व उर्दू विभाग में नामांकन पर रोक लगाए जाने से छात्रों, शिक्षकों तथा उर्दू प्रेमियों में गहरी निराशा व्याप्त हो गई थी. लेकिन कॉलेज के जागरूक और दृढ़ निश्चयी छात्रों ने इस निर्णय को चुपचाप स्वीकार नहीं किया. उन्होंने पूरी तरह शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद की. निरंतर प्रयास, संबंधित अधिकारियों से संवाद और अपने अधिकारों के लिए संगठित आंदोलन के परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय प्रशासन और झारखंड सरकार को अंततः उर्दू विभाग में नामांकन प्रक्रिया पुनः प्रारंभ करने का निर्णय लेना पड़ा.
आंदोलन में इनकी रही महत्वपूर्ण भूमिका
इस ऐतिहासिक आंदोलन में शबनम खातुन, मुमताज खातुन, मो. सादिक, मो. राहत, आयशा फिरदौस, शिबा सदफ, सोहाना परवीन, सीमा परवीन, सादिया सिद्दीकी, अली शाह इमाम, निखत परवीन, अलविया सिद्दीकी, मोहम्मद अबू दरदा, मोहम्मद अरबाज तथा मोहम्मद फहीम ने विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इन छात्रों ने आंदोलन को संगठित, अनुशासित और शांतिपूर्ण बनाए रखा तथा अपने साथियों का उत्साह लगातार बढ़ाते रहे. उनकी मेहनत, धैर्य, एकजुटता और सकारात्मक सोच ने यह सिद्ध कर दिया, कि यदि युवा लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढंग से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें, तो कठिन से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किया जा सकता है.
उर्दू विभाग में नामांकन की पुनर्बहाली केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि छात्रों की एकता, संघर्ष और दृढ़ संकल्प की ऐतिहासिक विजय है. यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगी. सेंट कोलंबस कॉलेज के ये सभी छात्र हार्दिक बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने अपने अथक प्रयासों से न केवल उर्दू विभाग का भविष्य सुरक्षित किया, बल्कि शिक्षा, लोकतंत्र और उर्दू भाषा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का भी प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया.
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