विनीत आभा उपाध्याय

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि किसी आपराधिक मामले में व्यक्ति के नाम का उल्लेख किए बिना केवल उसके पद के नाम पर समन जारी नहीं किया जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की नजर में कोई पद एक विधिक व्यक्ति नहीं होता है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने इस टिप्पणी के साथ दो याचिकाकर्ताओं के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई और रांची के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया.
सितंबर 2013 का है विवाद
यह विवाद सितंबर 2013 का है, जब शिकायतकर्ता ने मेसर्स हिंदुजा लेलैंड फाइनेंस लिमिटेड से एक 12-पहिया वाहन फाइनेंस कराया था. शिकायत के अनुसार 2 मार्च 2015 को कोयला ले जा रहे इस वाहन को रोककर जब्त कर लिया गया. आरोप लगाया गया था कि कंपनी के कर्मचारियों ने ड्राइवर के साथ मारपीट की, उससे 50,000 रुपये छीने और गाड़ी जब्त कर ली. इस शिकायत, बयान और गवाहों के बयानों के आधार पर मजिस्ट्रेट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 379, 504 और 506 के तहत प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए 5 अगस्त 2023 को समन जारी कर दिया था. इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि आपराधिक मामले में उस व्यक्ति के नाम का उल्लेख किए बिना केवल पद पर समन जारी नहीं किया जा सकता, जो उस पद को संभाल रहा है. मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ताओं का नाम दर्ज किए बिना केवल उनके पद के आधार पर समन जारी करके गंभीर अवैधता की है. अदालत ने माना कि ऐसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. अदालत ने सिविल कोर्ट के संज्ञान लेने के आदेश और 5 अगस्त 2023 के समन आदेश सहित पूरी आपराधिक कार्रवाई को पूरी तरह से निरस्त कर दिया.

