Ranchi: भारतीय राजस्व सेवा (IRS) की वरिष्ठ अधिकारी निशा उरांव के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने इस समय इंटरनेट पर नई बहस छेड़ दी है. उन्होंने मिशनरी स्कूलों के दोहरे मापदंड पर सवाल उठाया है. कहा है कि जब मिशनरी स्कूलों में गैर-ईसाई बच्चों के लिए प्रभु यीशु की प्रार्थना अनिवार्य की जाती है, तब कोई आपत्ति नहीं होती. लेकिन जब सनातन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, तो कथित मसीह समाज को आपत्ति क्यों होने लगती है?
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मुझे आज भी याद हैं यीशु के भजन
निशा उरांव ने अपने बचपन का अनुभव साझा करते हुए लिखा कि वह खुद कुछ समय तक मिशनरी स्कूल में पढ़ी हैं. वहां सभी छात्र-छात्राओं को एक डायरी दी जाती थी, जिसमें लिखे प्रभु यीशु के भजनों का नियमित अभ्यास कराया जाता था. यह प्रार्थना हर छात्र के लिए अनिवार्य थी. उन्होंने आगे लिखा है कि नियमित अभ्यास के कारण मुझे आज तक वो सभी प्रार्थनाएं और गीत याद हैं. उस समय किसी भी सनातनी परिवार ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की थी. फिर आज मसीह समाज को सनातन परंपराओं से कैसा परहेज है? यह सरासर दोहरा रवैया है.
सरकारी फंड लेने पर भी उठाए सवाल
महिला अफसर ने अपने पोस्ट में एक और गंभीर मुद्दा उठाते हुए याद दिलाया कि देश के कई मिशनरी स्कूलों को सरकारी योजनाओं के तहत मोटी आर्थिक सहायता (फंड) मिलती है. ऐसे में सरकारी संसाधनों का लाभ लेने वाले संस्थानों में एकतरफा नियमों और सनातन संस्कृति के प्रति विरोध को उन्होंने पूरी तरह से अनुचित ठहराया है. उनका यह बयान इस समय सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.


