Ranchi : हाईकोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) से जुड़े मामले में शिव शंकर शर्मा की सिविल रिव्यू याचिका खारिज कर दी है. मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि रिव्यू याचिका में ऐसा कोई भी आधार नहीं है जिससे यह साबित हो कि 9 मई 2025 के फैसले में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि (Error Apparent on the Face of Record) हुई है. अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता अपनी पूर्व की दलीलों को ही दोहराकर फैसले की समीक्षा कराना चाहता है, जो रिव्यू के दायरे में नहीं आता याचिकाकर्ता ने अदालत से 9 मई 2025 के फैसले के पैरा 32 और 36 में की गई उन टिप्पणियों को हटाने की मांग की थी, जिनमें उसकी विश्वसनीयता (Credentials) पर सवाल उठाते हुए कहा गया था कि उसने दुर्भावनापूर्ण मंशा से जनहित याचिका दायर कर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया. साथ ही उसने उस पर लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने को भी वापस लेने की मांग की थी।
‘जनहित याचिका की पवित्रता बनी रहे’
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आधार कार्ड संलग्न कर देने या स्वयं को जनहित में कार्य करने वाला व्यक्ति बताने मात्र से किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता स्थापित नहीं हो जाती. अदालत ने पाया कि मूल PIL में याचिकाकर्ता ने अपने क्रेडेंशियल्स के संबंध में पर्याप्त और ठोस विवरण नहीं दिया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री द्वारा प्रारंभिक जांच को न्यायिक स्तर पर क्रेडेंशियल्स की स्वीकृति नहीं माना जा सकता. खंडपीठ ने यह भी कहा कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जहां पेशेवर मुकदमेबाज जनहित याचिका का सहारा लेकर सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों पर दबाव बनाने या अन्य अनुचित उद्देश्य पूरे करने का प्रयास करते हैं. ऐसे मामलों पर समय रहते रोक लगाना आवश्यक है, ताकि जनहित याचिका की पवित्रता बनी रहे. अदालत ने इस दौरान Shiv Shankar Sharma के मामले में Supreme Court of India के वर्ष 2022 के फैसले का भी उल्लेख किया.

शीर्ष अदालत पहले ही Locus Standi पर सवाल उठा चुकी है
कोर्ट ने कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही इस याचिकाकर्ता के लोकस स्टैंडी (Locus Standi) पर सवाल उठा चुकी है और यह टिप्पणी कर चुकी है कि उसने पूर्व में भी न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए जनहित याचिकाएं दायर की थीं. इसलिए यह कहना गलत होगा कि हाईकोर्ट का पूर्व फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत है. बल्कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही हाईकोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन करता है. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने 50 हजार रुपये की लागत (कॉस्ट) समय पर जमा नहीं की और रिव्यू याचिका लंबित रहने का हवाला देकर भुगतान टालता रहा. अदालत ने इसे भी न्यायिक प्रक्रिया के प्रति निष्पक्ष आचरण नहीं माना.इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने रिव्यू याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पूर्व के फैसले या लगाए गए जुर्माने की समीक्षा का कोई आधार नहीं बनता. हालांकि, इस रिव्यू याचिका पर अलग से कोई अतिरिक्त लागत नहीं लगाई गई.


