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News Wave Expose : झारखंड में खनिज खदानों के 50% से अधिक पट्टों पर लगा ताला, सैकड़ों लीज लैप्स और सरेंडर, पढ़ें रिपोर्ट

Ranchi : झारखंड के भीतर खनन उद्योग की आंतरिक सेहत में बड़ा फेरबदल देखने को मिल रहा है. कहीं प्रशासनिक पेचीदगियां, कहीं...

Ranchi : झारखंड के भीतर खनन उद्योग की आंतरिक सेहत में बड़ा फेरबदल देखने को मिल रहा है. कहीं प्रशासनिक पेचीदगियां, कहीं कड़े पर्यावरणीय नियम, तो कहीं लीजधारकों की अपनी मजबूरियों के चलते राज्य के भीतर सैकड़ों खदानें खामोश हो चुकी हैं. राज्य में जितने खनन पट्टे (लीज) स्वीकृत हैं, उनमें से एक बड़ा हिस्सा या तो लैप्स हो चुका है, या लीजधारकों ने खुद घुटने टेकते हुए उन्हें सरेंडर कर दिया है.

धनबाद सर्किल (कोयला और पत्थर बेल्ट)

• धनबाद जिला : कुल स्वीकृत पट्टों में से केवल 45% खदानें (मुख्य रूप से बीसीसीएल और बड़े कोल ब्लॉक) वर्तमान में पूरी तरह सक्रिय हैं. पर्यावरण मंजूरी न मिलने के कारण 30% से अधिक छोटे पत्थर और बालू के पट्टे लैप्स हो चुके हैं. भारी जुर्माने और एनजीटी के कड़े नियमों के डर से 25% निजी ऑपरेटरों ने लीज सरेंडर कर दी है या वे अस्थायी रूप से बंद हैं.
• बोकारो जिला : कार्यरत लगभग 50% खदानें (सीसीएल और स्टील प्लांट से जुड़ी) चालू स्थिति में हैं. मुख्य रूप से गोमिया और बेरमो संभाग में स्थानीय विवादों और लीज नवीनीकरण (न होने से करीब 50% माइनर मिनरल पट्टे बंद या लैप्स श्रेणी में हैं.
• गिरिडीह जिला : केवल 35% पट्टे (कोयला और कुछ चुनिंदा क्रशर) सक्रिय हैं. अवैध खनन पर कड़ाई के बाद 65% पट्टे या तो प्रशासन द्वारा सस्पेंड कर दिए गए हैं या तकनीकी खामियों के कारण लैप्स हो चुके हैं.

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रांची सर्किल (राजधानी और बॉक्साइट क्षेत्र)

• रांची जिला : राजधानी के आसपास क्रशर और कंस्ट्रक्शन स्टोन की मांग के कारण केवल 40% पट्टे ही वर्किंग स्थिति में बचे हैं. डार्क जोन घोषित होने और एसटीए (STA) नियमों के उल्लंघन में 60% पट्टे लैप्स या सस्पेंड हो चुके हैं.
• लोहरदगा और गुमला जिला : बॉक्साइट का हब होने के कारण यहां 60% बड़े पट्टे (हिंडालको आदि) पूरी तरह कार्यरत हैं. 40% पुराने पट्टे ‘माइन क्लोजर प्लान’ के तहत सरेंडर किए जा चुके हैं या लीज अवधि समाप्त होने से लैप्स हो चुके हैं.
• रामगढ़ जिला : सीसीएल के बड़े कोल ब्लॉक के कारण 55% क्षेत्र वर्किंग है. 45% निजी स्टोन और सैंड माइनिंग पट्टे स्थानीय विरोध और एनओसीसी विवाद में लैप्स हो चुके हैं.
• खूंटी और सिमडेगा जिला : इस सुदूरवर्ती इलाके में केवल 20% छोटे पत्थर पट्टे कार्यरत हैं. 80% पट्टे ग्रामसभा की एनओसी न मिलने और लीज शर्तों को पूरा न करने के कारण कागजों पर ही लैप्स हो गए हैं.

कोल्हान सर्किल (लौह अयस्क का साम्राज्य)

• पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) : राज्य का सबसे कमाऊ जिला, जहां 65% लौह अयस्क और मैंगनीज की बड़ी खदानें (सेल, टाटा और बड़े निजी घराने) पूरी तरह वर्किंग हैं. MMDR एक्ट के तहत जिन खदानों की नीलामी समय पर नहीं हो पाई, वैसे 35% पट्टे पूरी तरह लैप्स या फ्रीज हो चुके हैं.
• पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) और सरायकेला :  लगभग 45% खदानें (कॉपर, यूरेनियम और कुछ स्टोन माइंस) सक्रिय हैं. वन भूमि के कड़े पेच के कारण 55% पट्टे या तो सरेंडर कर दिए गए हैं या प्रशासनिक स्तर पर सस्पेंड पड़े हैं.

हजारीबाग सर्किल (अभ्रक और भारी कोयला बेल्ट)

• कोडरमा जिला : माइका और स्टोन के केवल 15% पट्टे ही कानूनी रूप से वर्किंग हैं. लगभग 85% पट्टे पूरी तरह लैप्स या डिटरमाइंड (निरस्त) हो चुके हैं क्योंकि पूरा इलाका वन क्षेत्र और पर्यावरण के संवेदनशील जोन में आता है.
• हजारीबाग और चतरा जिला : एनटीपीसी और सीसीएल के मेगा प्रोजेक्ट्स के कारण 60% खदानें रिकॉर्ड उत्पादन के साथ कार्यरत हैं. लघु खनिजों (बालू और गिट्टी) के 40% पट्टे पर्यावरणीय स्वीकृतियां अटकने के कारण स्वतः लैप्स हो गए हैं.

दुमका सर्किल (संताल परगना – ब्लैक स्टोन हब)

• साहेबगंज और पाकुड़ जिला : क्रशर और ब्लैक स्टोन चिप्स उद्योग के लिए मशहूर इस बेल्ट में वर्तमान में केवल 30% पट्टे ही वैध रूप से वर्किंग हैं. जांच के बाद करीब 70% पट्टे या तो ‘सस्पेंड’ कर दिए गए हैं या पट्टाधारकों ने कानूनी कार्रवाई के डर से सरेंडर का रास्ता चुन लिया है.
• दुमका, देवघर और जामताड़ा : केवल 35% पट्टे कार्यरत हैं. 65% पट्टे लीज रिन्यूअल की फाइलें अटकने और समय पर माइनिंग चालान (ई-चालान) ब्लॉक होने के कारण लैप्स की श्रेणी में डाल दिए गए हैं.
• गोड्डा जिला : ईसीएल की बड़ी कोयला परियोजनाओं के कारण यहां 50% खदानें कार्यरत हैं. बाकी 50% माइनर मिनरल्स पट्टे पूरी तरह बंद या लैप्स हैं.

पलामू सर्किल (चूना पत्थर और ग्रेफाइट क्षेत्र)

• पलामू और गढ़वा जिला : बाजार में मंदी और परिवहन लागत बढ़ने से यहां केवल 25% चूना पत्थर (लाइमस्टोन) और डोलोमाइट पट्टे कार्यरत हैं. लगभग 75% पट्टेधारकों ने भारी घाटे और पेनाल्टी के कारण अपनी लीज स्वेच्छा से ‘सरेंडर’ कर दी है, जबकि कई पुराने आवंटन लैप्स हो चुके हैं.
• लातेहार जिला : कोयला और कुछ चुनिंदा खनिजों को मिलाकर 40% खदानें चालू हैं. उग्रवाद प्रभावित और वन बहुल क्षेत्र होने के कारण सुरक्षा और कागजी कमियों की वजह से 60% लीज बंद या लैप्स हो चुकी हैं.

 

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