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News Wave Special : झारखंड में अब किसानों के हाथ में होगी पानी की कमान, नौकरशाही का दखल होगा कम, नई नियमावली का दमदार खाका तैयार

Ranchi : राज्य सरकार ने सिंचाई प्रणालियों के संचालन और रखरखाव में नौकरशाही के दखल को न्यूनतम करते हुए सीधे अन्नदाताओं को...

Ranchi : राज्य सरकार ने सिंचाई प्रणालियों के संचालन और रखरखाव में नौकरशाही के दखल को न्यूनतम करते हुए सीधे अन्नदाताओं को जल संप्रभुता सौंपने की तैयारी कर ली है. झारखंड सहभागी सिंचाई प्रबंधन (संशोधन) नियमावली (2025) के नए ड्राफ्ट में यह स्पष्ट कर दिया है कि जल वितरण से लेकर उसकी वसूली और विवादों के निपटारे तक, अब किसान ही राजा होंगे.

2014 के नियम होंगे दरकिनार

पुराने 2014 के नियमों को दरकिनार कर लाए गए इस नए प्रस्ताव में न केवल ‘सहभागी सिंचाई प्रबंधन प्राधिकार’ जैसे पुराने ढांचों को विलोपित किया गया है, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाली त्रिस्तरीय कमिटियों को अभूतपूर्व वित्तीय और प्रशासनिक ताकतें दी गई हैं. यह नया संशोधन राज्य में पारंपरिक नहर प्रणालियों के साथ साथ आधुनिक मेगा लिफ्ट और भूमिगत पाइपलाइन परियोजनाओं में पानी की बर्बादी रोकने और अंतिम छोर तक समान जल वितरण सुनिश्चित करने में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है.

त्रिस्तरीय संस्थागत ढांचा : ग्राम स्तर से परियोजना स्तर तक नई व्यवस्था

• ग्राम या टोला स्तर : 10 से 50 हेक्टेयर के कमांड क्षेत्र वाले गांवों, टोलों या आउटलेट स्तर पर गठित होगा. यह किसानों का एक अनौपचारिक सम्मिश्रण होगा. नए नियमों के तहत इसे सामान्यत पंजीकृत नहीं किया जाएगा, ताकि किसान बिना किसी कानूनी पेचीदगी के सीधे काम कर सकें. हालांकि, विशेष परिस्थितियों में सरकार की गाइडलाइन के अनुसार इसका निबंधन हो सकता है.

वितरणी स्तर (जल उपयोगकर्ता महासंघ) : 4 से 10 जल उपयोगकर्ता संघों के अध्यक्ष और सचिव को मिलाकर माइनर या वितरणी (डिस्ट्रीब्यूटरी) स्तर पर महासंघ का गठन होगा. नए नियमों के तहत मुख्य नहर में जल प्रवाह की दिशा में आने वाले सीधे आउटलेट्स को भी इस महासंघ में शामिल करने का तार्किक प्रावधान किया गया है. इसे भी सामान्य परिस्थितियों में अपंजीकृत ही रखा गया है.

• परियोजना स्तर (परियोजना समिति) : न्यूनतम दो या अधिक जल उपयोगकर्ता महासंघों के पदाधिकारियों (अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष) को मिलाकर पूरे कमांड क्षेत्र के लिए ‘परियोजना समिति’ बनेगी. यह समिति अब प्रमंडल स्तर पर गठित होगी और यदि किसी परियोजना का कार्यक्षेत्र एक से अधिक प्रमंडल में है, तो प्रत्येक प्रमंडल में अलग परियोजना समिति बनेगी. सबसे खास बात यह है कि इसे सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत अनिवार्य रूप से पंजीकृत किया जाएगा.

• मेगा लिफ्ट और भूमिगत पाइपलाइन योजनाओं का विशेष समावेश :  पुराने नियमों में आधुनिक सिंचाई तकनीकों पर विशेष ध्यान नहीं था, लेकिन नए ड्राफ्ट में ‘भूमिगत पाइपलाइन और मेगा लिफ्ट सिंचाई योजनाओं’ के लिए विशेष नियम बनाए गए हैं. इसके तहत किसी नियंत्रण प्रणाली के अधीन 10-50 हेक्टेयर में जल उपयोगकर्ता संघ बनेंगे. 6 से 15 संघों को मिलाकर एक महासंघ बनेगा. एक कंट्रोल सिस्टम के अंदर आने वाले सभी आउटलेट एक ही महासंघ का हिस्सा होंगे. जिससे पानी के प्रेशर और वितरण को तकनीकी रूप से नियंत्रित करना आसान होगा. लघु उद्वहन (लिफ्ट), भूमिगत पाइपलाइन और मेगा लिफ्ट योजनाओं के मामले में पीआइएम की प्रक्रियाएं योजना निर्माण (प्लानिंग) के चरण से ही शुरू हो जाएंगी, ताकि बाद में किसानों को संचालन में दिक्कत न आए.

• राज्य स्तरीय कार्यकारिणी समिति का पुनर्गठन : प्रशासनिक स्तर पर भी इस नियमावली में बहुत बड़ा फेरबदल किया गया है. पुराने प्रावधानों में मौजूद ‘झारवाटर’ से जुड़ी कई कड़ियों और ‘विशेष सचिव सह मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी’ के पद से जुड़े क्लॉज को संशोधित या डिलीट कर दिया गया है.अब जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रधान सचिव या सचिव की अध्यक्षता में एक शक्तिशाली राज्य स्तरीय कार्यकारिणी समिति काम करेगी. विभाग के संयुक्त सचिव के अंतर्गत एक विशेष ‘सहभागी सिंचाई प्रबंधन कोषांग का गठन किया जाएगा. यह कोषांग नीति निर्धारण, बजट को अंतिम रूप देने, और गैर-सरकारी संगठनों या वाल्मी जैसी सुविधा प्रदाता एजेंसियों को पैनलबद्ध करने का काम करेगा.

• अधिकारों का विकेंद्रीकरण :  गबन या गड़बड़ी होने पर कार्यपालक अभियंता लेंगे एक्शन

• नए संशोधनों के जरिए जमीनी स्तर पर सरकारी अधिकारियों और किसान संगठनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है.

• वित्तीय शक्तियां और प्रलेख : प्रत्येक जल उपयोगकर्ता संघ और महासंघ को कमांड क्षेत्र का मानचित्र, सदस्यता सूची, रोकड़ बही (कैश बुक), पासबुक, और जल शुल्क संग्रहण पंजी का संधारण करना होगा. परियोजना समिति सभी महासंघों के समेकित रिपोर्ट रखेगी.

• सख्त कारवाई के अधिकार : यदि कोई जल उपयोगकर्ता संघ, महासंघ या परियोजना समिति किसी भी प्रकार के गबन, धोखाधड़ी या सरकारी राशि के दुरुपयोग में संलिप्त पाई जाती है, तो प्रमंडलीय कार्यपालक अभियंता को उस सिंचाई प्रणाली के नियंत्रण को सीधे अपने हाथ में लेने (अधिग्रहण करने) की शक्ति दी गई है.

• लोकतांत्रिक सुरक्षा चक्र : हालांकि, नौकरशाही के एकाधिकार को रोकने के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि नियंत्रण हाथ में लेने के 6 महीने के भीतर कार्यपालक अभियंता या सुविधा प्रदाता एजेंसी को एक नई समिति का गठन करना होगा और जिम्मेदारी दोबारा किसानों को सौंपनी होगी.

• कानूनी शक्ति : नहर, पाइपलाइन या माइनर को क्षति पहुंचाने या अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ परियोजना समिति या कार्यपालक अभियंता को बिहार सिंचाई अधिनियम 1997 की धारा 82-90 के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार होगा.

वाटर टैरिफ कलेक्शन और आत्मनिर्भरता का रोडमैप

• यह संशोधित नियमावली किसानों को आत्मनिर्भर बनाने पर केंद्रित है. अब कमिटियां खुद पूरे कमांड क्षेत्र के लिए सीजनल फसल योजना तैयार करेंगी और पानी की आवश्यकता तय करेंगी.

• सरकार द्वारा निर्धारित प्रचलित दरों पर किसान संगठनों को पानी आवंटित किया जाएगा.

• ये संगठन किसानों से वाटर टैरिफ वसूलेंगे और सरकार के नियमानुसार उसे जमा करेंगे.

• माइक्रो लिफ्ट प्रणालियों के मामले में जल शुल्क का निर्धारण और संग्रहण की पद्धति तय करने की पूरी आजादी स्थानीय समुदाय को दी गई है.

• कमिटियों की बैठक प्रणाली को भी कड़ा किया गया है- अब सामान्य निकाय की बैठक साल में दो बार (अप्रैल और नवंबर) होगी. जबकि कार्यकारी समिति की बैठक हर तीन महीने (त्रैमासिक) में कम से कम एक बार जरूर होगी, ताकि पारदर्शिता बनी रहे.

कृषि विकास और कन्वर्जेंस का नया सवेरा

झारखंड सहभागी सिंचाई प्रबंधन (संशोधन) नियमावली (2025) का यह नया रूप केवल पानी बांटने का जरिया नहीं है, बल्कि ग्रामीण विकास की विभिन्न कड़ियों को जोड़ने वाला एक मजबूत पुल है. इन किसान संगठनों को मनरेगा, राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन जैसी योजनाओं के साथ अभिसरण करने की शक्ति दी गई है. इससे खेतों के समतलीकरण, मेढ़ निर्माण और ड्रिप इरिगेशन जैसे आधुनिक तौर-तरीकों को बढ़ावा मिलेगा.

 

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