Ranchi: झारखंड में वर्षों से पौधारोपण के नाम पर बहाए जा रहे अरबों रुपयों का अब कच्चा चिट्ठा खुलने वाला है. अब वन विभाग के अधिकारियों के बनाए गए फर्जी रजिस्टर और मनगढ़ंत आंकड़े नहीं चलेंगे. अब झारखंड के 24 जिलों और 49 वन प्रमंडलों में हुए कामों की जांच के लिए तीसरी आंख यानी थर्ड पार्टी एजेंसी की एंट्री होने जा रही है. यह एजेंसी सिर्फ दूर से देखकर रिपोर्ट नहीं बनाएगी, बल्कि जंगल के चप्पे-चप्पे में जाकर, एक-एक पेड़ की गिनती करेगी, इंची टेप से उनकी ऊंचाई नापेगी और जिओ-टैग की गई तस्वीरों के साथ वन विभाग के दावों की पोल खोलेगी.
आखिर जांच की जरूरत क्यों पड़ी
वर्ष 2010-11 से लेकर आज तक कैंपा (क्षतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण) के तहत झारखंड में प्राकृतिक जंगलों के विकास, वन्यजीव प्रबंधन, बंजर वन क्षेत्रों में पौधारोपण, और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बेहिसाब पैसा खर्च किया गया है. नियम के मुताबिक, जब भी विकास कार्यों (खदान, सड़क या फैक्ट्री) के लिए जंगल काटे जाते हैं, तो उसकी भरपाई के लिए कैंपा फंड से नए पेड़ लगाए जाते हैं. लेकिन क्या वो पेड़ सच में बचे हैं? क्या वे बड़े हुए हैं? इसी सच्चाई का पता लगाने के लिए अब एक स्वतंत्र थर्ड पार्टी एजेंसी को मैदान में उतारा जा रहा है. यह एजेंसी कैंपा की वार्षिक कार्य योजना सामांतर मूल्यांकन करेगी.

रडार पर क्या-क्या होगा
- पौधारोपण की हकीकत: क्षतिपूरक वणीकरण, एनपीवी पौधारोपण, कृत्रिम और प्राकृतिक पुनरुत्पादन के दावों की जमीनी पड़ताल.
- मिट्टी और पानी का संरक्षण: क्या सच में जंगलों में मिट्टी और नमी बचाने के उपाय हुए हैं? स्थायी नर्सरियों का हाल कैसा है?
- वन्यजीव सुरक्षा: जानवरों और इंसानों के बीच संघर्ष कम करने के लिए क्या काम हुआ? जंगलों में बनाए गए वाटर होल्स और वन्यजीव सुरक्षा के इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति क्या है?
- सड़कें और पुलिया: वन पथों (जंगल की सड़कों) का सुदृढ़ीकरण, कॉजवे और पुलिया के निर्माण और मरम्मत में लगाए गए पैसों का हिसाब.
कैसे होगी जांच
- अचानक चुने जाएंगे इलाकेः पूरे राज्य में 10% सैंपलिंग साइज के आधार पर मूल्यांकन होगा. ब्लॉक पौधारोपण में, यदि साइट 1 हेक्टेयर या उससे छोटी है, तो 100% (पूरे के पूरे) पेड़ों की गिनती होगी. अगर साइट 1 हेक्टेयर से बड़ी है, तो 10% हिस्से की पूरी छानबीन होगी. वहीं सड़क किनारे या अन्य लीनियर पौधारोपण में कुल लंबाई का 10% हिस्सा रैंडम तरीके से जांचा जाएगा. बिना-पौधारोपण वाले कार्यों (जैसे सड़क, चेक डैम आदि) में 50% सैंपल की जांच होगी.
- ग्रामीणों और अधिकारियों से सीधी पूछताछ: एजेंसी सिर्फ जंगलों में नहीं घूमेगी, बल्कि संयुक्त वन प्रबंधन समितियों और ग्रामीणों के साथ फोकस ग्रुप डिस्कशन करेगी. हर इलाके में कम से कम 10 घरों से पूछताछ की जाएगी और हर वन प्रमंडल में 2 मुख्य लोगों का इंटरव्यू लिया जाएगा. यह सब बकायदा हस्ताक्षर के साथ रिकॉर्ड होगा.
- कोई वीआइपी ट्रीटमेंट नहीः सबसे बड़ी बात यह है कि इस पूरी जांच के दौरान थर्ड पार्टी एजेंसी के रहने, खाने और ट्रांसपोर्टेशन का सारा खर्च एजेंसी खुद उठाएगी. वन विभाग की गाड़ियों का इस्तेमाल नहीं होगा, ताकि जांच पूरी तरह से निष्पक्ष रहे और अधिकारी जांचकर्ताओं को प्रभावित न कर सकें.
- इंच टेप से नापी जाएगी पेड़ों की सेहतः वन विभाग यह कहकर नहीं बच सकता कि हमने पेड़ लगाए थे, जानवर खा गए या बारिश नहीं हुई. पेड़ों के जीवित रहने और उनकी सेहत की जांच के लिए एक सख्त वैज्ञानिक और गणितीय तरीका अपनाया जाएगा.
- हर 10वीं लाइन, हर 10वां पेड़: ब्लॉक पौधारोपण में जांच टीम किसी भी एक लाइन को शुरुआती लाइन मान लेगी. उसके बाद सीधे हर 10वीं लाइन में लगे सभी पेड़ों को गिनेगी—चाहे वे जीवित हों या मृत.
- ऊंचाई और मोटाई की नाप-जोख: पेड़ों की सेहत जांचने के लिए प्लांट की ऊंचाई और मोटाई नापी जाएगी. 3 साल पुराने पौधों की मोटाई जमीन से 50 सेंटीमीटर ऊपर से और 5 साल पुराने पौधों की 100 सेंटीमीटर ऊपर से नापी जाएगी. उससे पुराने पेड़ों के लिए चेस्ट हाइट पर मोटाई जांची जाएगी.
- फर्जीवाड़ा रोकने की तकनीक: जिस लाइन की जांच हो रही है, उसमें किसी भी एक पौधे से शुरुआत कर हर 10वें पौधे की ऊंचाई नापी जाएगी. अगली लाइन में यह क्रम बदल दिया जाएगा (रैंडम नंबर का उपयोग करके) ताकि अधिकारी पहले से ही कुछ खास पेड़ों को तैयार करके जांच टीम को गुमराह न कर सकें.
- जिओ-टैगिंग, तस्वीरें और पुराने रिकॉर्ड्स से होगा क्रॉस-वेरिफिकेशनः रिपोर्ट को कागजी खानापूर्ति बनने से रोकने के लिए एजेंसी को हर साइट से अलग-अलग एंगल से कम से कम तीन तस्वीरें लेनी होंगी. इन तस्वीरों में तारीख और जिओ-कोऑर्डिनेट्स’ का होना अनिवार्य है. यह तस्वीरें ड्राफ्ट रिपोर्ट और सॉफ्ट कॉपी दोनों में देनी होंगी.
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