Regarding FCRA: अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा है कि फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) में किए गए बदलावों का मकसद विदेशी फंडिंग में ज्यादा पारदर्शिता लाना है. उन्होंने उम्मीद जताई कि संगठन तय प्रक्रिया का पालन करते हुए ही विदेशी धन प्राप्त करेंगे. रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई पोस्ट के जरिए क्वात्रा ने कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी वित्तीय प्रवाह को नियंत्रित करना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के मद्देनजर उठाया गया एक संप्रभु कदम है. उन्होंने इस संदर्भ में अमेरिका सहित कई देशों में लागू ऐसे ही कानूनों का भी हवाला दिया.
विदेशी फंडिंग को लेकर कई देशों में कानून लागू : क्वात्रा
क्वात्रा ने कहा कि अमेरिका में 1938 से FARA (फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट) और 2010 से FATCA (फॉरेन अकाउंट टैक्स कंप्लायंस एक्ट) लागू है. ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में और कनाडा ने 2024 में कानून बनाया. UK की योजना जुलाई 2025 में लागू हुई. EU अभी कानून बना रहा है.
यह भी पढ़ें: रांची: छात्र कर रहे हैं CBI जांच की मांग, वार्ता के नाम पर टहला रही है सरकार- बाबूलाल मरांडी
अमेरिका सांसद ने FCRA को लेकर जताई थी चिंता
क्वात्रा का एक्स पर यह बयान एक अमेरिकी सांसद द्वारा FCRA में किए गए संशोधनों पर चिंता जताए जाने के कुछ दिनों बाद आया. अमेरिकी सांसद ने दावा किया था कि इन बदलावों से भारतीय सरकार को चर्चों और चैरिटी संस्थाओं पर नियंत्रण करने की अनुमति मिल जाएगी. क्वात्रा ने कहा कि जब किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द या सरेंडर किया जाता है, तो उसके पास मौजूद विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्ति पहले से ही राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आ जाती है. उन्होंने कहा कि यह प्रावधान 2010 से लागू है. क्वात्रा ने कहा कि 2026 का बिल जो नई चीज जोड़ता है, वह है उन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक अधिकृत अथॉरिटी और वापसी का एक रास्ता. अगर संगठन अपना रजिस्ट्रेशन बहाल कर लेता है, तो सभी संपत्तियां और बिना इस्तेमाल किए गए फंड पूरी तरह से वापस कर दिए जाते हैं.’
पूजा स्थलों की संपत्ति को लेकर भारतीय राजदूत ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि पूजा स्थलों की अपनी सुरक्षा व्यवस्था होती है. जहां किसी रद्द किए गए संगठन ने पूजा स्थल से जुड़ी संपत्ति बनाई है, वहां पूजा की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए वह संपत्ति उसी धर्म के किसी अन्य FCRA-पंजीकृत संगठन को सौंप दी जाती है
भारतीय राजदूत ने आशंकाओं को किया खारिज
राजदूत ने उन आशंकाओं को भी खारिज किया कि FCRA में किए गए बदलावों का मकसद सिविल सोसाइटी संगठनों को मिलने वाली विदेशी सहायता पर रोक लगाना है. क्वात्रा ने कहा कि हजारों संगठन FCRA के तहत पंजीकृत हैं और नियमित रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान और मानवीय कार्यों के लिए विदेशी फंड प्राप्त करते हैं.
भारत में 30 लाख से ज्यादा NGO, मात्र 14,450 संगठनों के पास ही FCRA रजिस्ट्रेशन
उन्होंने कहा कि भारत में 30 लाख से ज्यादा NGO हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम, यानी 14,450 संगठनों के पास ही FCRA रजिस्ट्रेशन है. क्वात्रा ने कहा कि इस प्रकार, सिविल सोसाइटी संगठनों का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से इस कानून के दायरे से बाहर है. उन्होंने बताया कि भारत ने पहली बार 1976 में FCRA लागू किया था और 2010 में इसमें बदलाव करके ज्यादा आधुनिक ढांचा तैयार किया गया.
‘ज्यादा पारदर्शिता, बेहतर गवर्नेंस और साफ नियम’
क्वात्रा ने कहा कि 2016, 2018 और 2020 में किए गए बदलावों ने FCRA को और मजबूत किया. 2026 का बिल और नियम इसी दिशा में अगला कदम हैं: ज्यादा पारदर्शिता, बेहतर गवर्नेंस और साफ नियम.
यह भी पढ़ें: मानसून सत्र: ध्वनिमत से 8,399 करोड़ का अनुपूरक बजट पास, JAC की जांच की मांग उठी
विदेशी फंडिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा पर क्वात्रा ने क्या कहा?
क्वात्रा ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी पैसे के लेन-देन को रेगुलेट करना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के कारण उठाया गया एक संप्रभु कदम है. यह दुनिया भर के कई लोकतंत्रों में आधुनिक गवर्नेंस की एक स्वीकृत विशेषता है.
‘कानून धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू’
क्वात्रा ने उन दावों को भी खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि FCRA में बदलाव किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए किए गए हैं. उन्होंने कहा कि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. यह कानून धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है. हर धर्म के संगठनों द्वारा धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों के रखरखाव और चैरिटी के कामों सहित आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियां विदेशी फंडिंग पाने के लिए योग्य बनी हुई हैं.
