हाल-ए- सचिवालयः प्रमोशन का इंतजार-ए-इश्क, IAS की कुर्सी और राज्य सेवा के अफसरों की ठंडी होती उम्मीदें

Ranchi: झारखंड के गलियारों में आजकल एक ही चर्चा है, आईएएस बनने का सपना, या हकीकत का कोई अंतहीन उपन्यास. राज्य प्रशासनिक...

Ranchi: झारखंड के गलियारों में आजकल एक ही चर्चा है, आईएएस बनने का सपना, या हकीकत का कोई अंतहीन उपन्यास.  राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की स्थिति कुछ ऐसी है कि वे आईएएस बनने की रेलगाड़ी के स्टेशन पर खड़े तो हैं, लेकिन गाड़ी है कि डिरेल होने के डर से सिग्नल ही नहीं मिल रहा. कैलेंडर 2026 की ओर बढ़ रहा है, लेकिन 14 कुर्सियां अभी भी खाली पड़ी हैं और साहब लोग बस वेटिंग लिस्ट का टिकट लिए बैठे हैं.

चाय की चुस्कियों के साथ गजब की चर्चा

नियम कहता है कि 14 पदों के लिए 42 नाम यूपीएससी के पास जाने चाहिए, लेकिन यहां तो स्थिति यह है कि नाम तो दूर, फाइलों को टेबल से दूसरी टेबल तक जाने के लिए भी परेशानी हो रही है. विभाग के गलियारों में अब चाय की चुस्कियों के साथ चर्चाएं जोरों पर हैं. एक सीनियर अधिकारी दबी जुबान में कहते हैं, कि भाई, ये तो वही बात हो गई कि शादी की तारीख तय है, मेहमानों का स्वागत भी हो गया, लेकिन दूल्हा अभी भी यह सोच रहा है कि शेरवानी पहनूं या कुर्ता-पायजामा. वहीं, दूसरे साहब चुटकी लेते हुए कहते हैं, ये तो फाइलों को कोल्ड स्टोरेज में डालने की कलाकारी है. शायद विभाग को डर है कि कहीं आईएएस बनते ही ये लोग अपनी पुरानी फाइलों का हिसाब न मांगने लगें.

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कोर्ट का ग्रीन सिग्नल और विभाग का रेड लाइट मोड

सबसे अहम बात तो यह है कि 10 दिसंबर को ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि सूची भेजने पर कोई रोक नहीं है. बिहार ने अपने 14, गुजरात ने 17 और त्रिपुरा ने 6 अफसरों को आईएएस का तमगा पहना भी दिया. लेकिन झारखंड की फाइलें अभी भी अटल हैं.

क्यों है यह सस्पेंस इतना गहरा

पूरा मामला वरीयता सूची के उस भंवर में फंसा है, जिसे बिहार पुनर्गठन के समय से सुलझाया जा रहा है.  अफसरों के बीच अब एक नया जुमला चल पड़ा है कि हमारा प्रमोशन यानी कल का सूरज, जो हर दिन निकलता तो है, लेकिन शाम को फिर गायब हो जाता है. प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि अगर यह खेल ऐसे ही चलता रहा, तो कहीं ऐसा न हो कि अफसर आईएएस बनने की उम्र पार कर लें और कुर्सियां खाली की खाली रह जाएं.

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