विनीत आभा उपाध्याय
Delhi/Ranchi: देश की सर्वोच्च अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि विशुद्ध रूप से चल रहे पारिवारिक संपत्ति विवादों को आपराधिक या एससी/एसटी एक्ट का रंग देकर अग्रिम जमानत का अधिकार नहीं छीना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इनकार करते हुए आरोपी जीजा की अग्रिम जमानत रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया है. यह विवाद राजधानी रांची के चुटिया की रहने वाली स्वाति कच्छप और उनके जीजा निर्मल प्रसाद साहू के बीच का है. दोनों के बीच लंबे समय से एक फ्लैट और संपत्ति को लेकर पारिवारिक विवाद चल रहा था.

इस बीच स्वाति कच्छप ने रांची की विशेष SC/ST अदालत में एक शिकायत दर्ज कराई गई है. अपनी शिकायत में उन्होंने अपने जीजा के खिलाफ आईपीसी की धारा 323, 341 और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(r)(s) के तहत गंभीर आरोप लगाए थे. जिसके बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी जीजा ने झारखंड हाई कोर्ट का रुख किया था. 1 मई 2026 को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के न्यायाधीश राजेश कुमार की अदालत ने पाया कि यह मूल रूप से जीजा और साली के बीच का एक प्रॉपर्टी विवाद है.
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि संपत्ति के दीवानी विवाद को सुलझाने या दबाव बनाने के लिए SC/ST और आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया गया था. मामले की प्रकृति को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी थी. हाई कोर्ट के इसी आदेश को चुनौती देते हुए स्वाति कच्छप ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि हाई कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई राहत कानूनी रूप से बिल्कुल सही है. शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और अग्रिम जमानत रद्द करने से साफ इनकार कर दिया.
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