विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi: झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक के उस हलफनामे को बेहद अवमानना जनक करार दिया है जिसमें हाई कोर्ट के पुराने आदेश के तहत एक कर्मचारी को मिले वित्तीय लाभ को गलत बताया गया था. अदालत ने कहा कि जब हाई कोर्ट की एक समन्वय पीठ के निर्देश पर विभाग ने कर्मचारी को पूर्व में एसीपी (ACP) का लाभ दे दिया था तो अधिकारी को उसे गलत बताने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए था. इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को तीसरे एमएसीपी (MACP) के तहत उच्च ग्रेड पे देने से इनकार करने को मनमाना और समानता का अधिकार का उल्लंघन माना. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने शैलेश कुमार सिंह द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 4800 रुपए ग्रेड पे के साथ तीसरे MACP लाभ के दावे को खारिज करने वाले सरकारी आदेश को रद्द कर दिया. याचिकाकर्ता को 1978 में एक क्लर्क (लिपिक) के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने 2008 में अपनी सेवा के 30 वर्ष पूरे कर लिए थे.

क्या है पूरा मामला
पूर्व में हाई कोर्ट के एक आदेश के अनुपालन में विभाग ने उन्हें संशोधित पहला और दूसरा ACP लाभ देते हुए 5000–8000 रुपए और 5500–9000 रुपए का उच्च वेतनमान दिया था. लेकिन जब उन्हें तीसरा MACP देने की बारी आई तो विभाग ने उन्हें 4800 रुपए के बजाय केवल 4600 रुपये का ग्रेड पे दिया. इसके खिलाफ उनकी याचिका को भी विभाग ने खारिज कर दिया था. याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जब उन्हें दूसरे ACP के तहत 5500-9000 रुपए का वेतनमान मिल चुका था तो वे तीसरे MACP के तहत 4800 रुपए ग्रेड पे के हकदार थे. उन्होंने यह भी बताया कि दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के उनके जैसे ही अन्य क्लर्कों को यह लाभ मिल चुका था लेकिन कोल्हान प्रमंडल में तैनात होने के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा था.
भेदभाव पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में दलील दी थी कि याचिकाकर्ता को पहले की योजना के तहत गलत तरीके से उच्च ACP लाभ दिया गया था. इस पर कोर्ट ने अधिकारी की खिंचाई करते हुए कहा कि एक बार जब हाई कोर्ट के फैसले के अनुपालन में लाभ दे दिया गया तो प्राकृतिक रूप से वे 4800 रुपए ग्रेड पे के हकदार हो जाते हैं. कोर्ट ने कहा कि दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के समान पद वाले कर्मचारियों को लाभ देना और याचिकाकर्ता को केवल कोल्हान प्रमंडल में होने के कारण वंचित रखना भेदभाव है.
विभाग को दिया लाभ देने का निर्देश
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के विस्तृत आवेदन को खारिज करने वाला सरकारी आदेश बिना किसी ठोस कारण के था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्णयों के कारणों को बाद में हलफनामे के जरिए नहीं सुधारा जा सकता. हाई कोर्ट ने विभाग के आदेश को असंवैधानिक और मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया. कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 1 सितंबर 2008 से पे बैंड-II (9300–34800 रुपए ) में 4800 रुपए ग्रेड पे के साथ तीसरे MACP का लाभ और इसके परिणामस्वरूप मिलने वाले सभी वित्तीय बकाए का भुगतान किया जाए.
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