Hazaribagh: अगर आपको लगता है कि हजारीबाग के ‘बोडम बाजार’ का राज सिर्फ उसकी सीधी गलियों और दुकानों तक खत्म हो जाता है, तो अपनी सांसें थाम लीजिए. क्योंकि इतिहास की परतों और पुराने सैन्य रिकॉर्ड्स से जो सच अब बाहर आया है, वो हजारीबाग के भूगोल को एक नए और बेहद दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है. जिसे हम आज ‘बोडम बाजार’ कहते हैं, वह दरअसल एक ऐसी विशाल ‘मिलिट्री सिटी’ का हिस्सा था, जिसके ऊपर से आज पूरा हजारीबाग रोज गुजरता है, लेकिन उसके नीचे दबे अतीत से बिल्कुल अनजान है.
सेंट कोलंबा से लेकर मिशन स्कूल तक फैला ‘द ग्रेट कंटोनमेंट’
इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक चौंकाने वाला नक्शा सामने आता है. आज हम जिन जगहों को शिक्षा का मंदिर कहते हैं, वो सन 1790 और 1800 के शुरुआती दशकों में बारूद और मिलिट्री बूटों की धमक से कांपा करती थीं. कैप्टन बोडम ने पूरी छावनी को इस तरह डिजाइन किया था कि शहर के सारे मुख्य केंद्र एक-दूसरे से जुड़े रहें. आज की यह मशहूर ऐतिहासिक लाल इमारत और इसके आसपास का इलाका, 1884 तक जब हजारीबाग एक सक्रिय छावनी था, तब ब्रिटिश मिलिट्री और मिशनरी पत्राचार के मुख्य प्रशासनिक केंद्र के रूप में इस्तेमाल होता था.
कार्मेल स्कूल से मिशन स्कूल का कॉरिडोर
पुराने नक्शे गवाह हैं कि आज के कार्मेल स्कूल से लेकर मिशन स्कूल तक का जो पूरा इलाका है, वही कैप्टन बोडम की असली और मुख्य ‘कंटोनमेंट बाउंड्री’ हुआ करती थी। यानी आज जहां बच्चे कॉपियां और किताबें लेकर जाते हैं, वहां कभी फौजियों के बैरक हुआ करते थे.
इस ऐतिहासिक थ्रिलर का सबसे सस्पेंस और दिलचस्प मोड़ आता है आज के होली क्रॉस के परिसर पर जहां बेटियां और महिलाएं आत्मनिर्भर बनने की ट्रेनिंग लेती हैं, वो ब्रिटिश काल का सबसे गुप्त मनोरंजन केंद्र था. पुराने सरकारी रिकॉर्ड्स और स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि यह ब्रिटिश अफसरों की ‘नाच बाड़ी’ हुआ करती थी. शाम ढलते ही यहां मोमबत्तियों की रोशनी में महफिले सजती थीं, संगीत गूंजता था और कूटनीति के बीच जंग की बड़ी-बड़ी रणनीतियां तय की जाती थीं.
द परेड ग्राउंड्स: जहां गूंजती थी ‘रामगढ़ बटालियन’ की दहाड़
फौज होगी तो कदमताल भी होगी और हथियारों की टेस्टिंग भी. कैप्टन बोडम ने इसके लिए शहर के तीन सबसे बड़े कोनों को चुना, पीटीसी ग्राउंड, मिशन स्कूल मैदान वेल्स ग्राउंड जो आज भी हजारीबाग के सबसे बड़े मैदान है. ये तीनों मैदान आज भले ही खिलाड़ियों और रैलियों के काम आते हों, लेकिन यह वही ऐतिहासिक ‘परेड ग्राउंड्स’ हैं, जहां सुबह की पहली किरण के साथ रामगढ़ बटालियन के हजारों सैनिक युद्ध का अभ्यास करते थे और मिलिट्री मार्च निकाला करते थे.
सस्पेंस अभी और गहरा है…
हजारीबाग के सीने पर बने इस सवा दो सौ साल पुराने ब्रिटिश चक्रव्यूह की परतें तो अभी सिर्फ खुलना शुरू हुई हैं. सेंट कोलंबा की वो ऐतिहासिक इमारतें, कार्मेल और मिशन स्कूल के बीच की वो अदृश्य सैन्य सीमाएं और होली क्रॉस की वो ‘नाच बाड़ी’… यह सब गवाह हैं कि बोडम बाजार का इतिहास जितना गहरा है, उतना ही तिलस्मी भी. लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती. इस मिलिट्री बेस के कुछ और पन्ने, कुछ और गुप्त कड़ियां बहुत जल्द सामने आने वाली हैं, जो हजारीबाग के इतिहास की पूरी किताब को ही पलट कर रख देंगे.
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