विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi: एक वैवाहिक विवाद में शुरू हुई डीएनए टेस्ट को लेकर पिछले 14 वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई आखिरकार अब खत्म हो गई है.झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में डीएनए टेस्ट का आदेश देने से साफ इनकार कर दिया है. अदालत ने टिप्पणी की कि जिस बच्चे की पितृत्व पर सवाल उठाया गया था वह इस लंबी मुकदमेबाजी के दौरान अब वयस्क हो चुका है. जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की एकल पीठ ने लखन कुमार मंडल द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया. याचिकाकर्ता ने गिरिडीह की एक फैमिली कोर्ट द्वारा दिसंबर 2011 में दिए गए उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसके बेटे के डीएनए टेस्ट की मांग को ठुकरा दिया गया था. यह मामला इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे एक लंबी कानूनी प्रक्रिया विवाद के मूल स्वरूप को ही बदल देती है.

बच्चे के के युवा होने पर बदला मामले का स्वरूप
लखन मंडल ने जब 2010 में पहली बार डीएनए टेस्ट की मांग की थी तब बच्चा केवल 8 वर्ष का था और उसकी मां कानूनी रूप से उसका प्रतिनिधित्व कर सकती थी. लेकिन साल 2012 में हाईकोर्ट में दायर की गई रिट याचिका पर जब इस मामले में अंतिम फैसला आया तब तक वह बच्चा 24 साल का युवा हो चुका था. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब बच्चा वयस्क हो जाता है तो उसकी मां उसकी ओर से डीएनए टेस्ट के लिए सहमति नहीं दे सकती.चूंकि याचिकाकर्ता ने बच्चे के वयस्क होने के बाद उसे इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया इसलिए अदालत न तो अब उस युवक को टेस्ट के लिए मजबूर कर सकती है और न ही बेटे के इनकार करने पर मां के खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती है.
क्या है पूरा मामला
रिकॉर्ड के मुताबिक वर्ष 2012 में दायर यह याचिका सालों तक लंबित रही और 2021 में जाकर स्वीकार हुई तब तक बच्चा बालिग हो चुका था. लखन कुमार मंडल की शादी 12 जुलाई 2000 को फूलमती देवी के साथ हुई थी.वह जनवरी 2001 से अप्रैल 2002 के बीच सूरत में काम करता था. जब वह घर लौटा, तो उसने अपनी पत्नी को गर्भवती पाया और उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया.बच्चे के जन्म के लगभग 6 साल बाद 2008 में तलाक का मुकदमा दायर किया गया. इसके बाद 2010 में गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद लखन ने डीएनए टेस्ट के लिए आवेदन किया था.
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