Ranchi : झारखंड विधानसभा का परिसर, माहौल में वोटिंग की सरगर्मी और हवा में तैरती राहत की सांसें. दो दिनों से जो माननीय लोकतंत्र के पवित्र पिंजरे में बंद थे, वे आखिरकार वोट डालने के बाद ऐसे चहकते नजर आए. परिसर के एक कोने में कुछ विधायकों की महफिल जमी थी. जहां न तो किसी नीति पर चर्चा हो रही थी और न ही जनहित पर. वहां तो बस एक ही सुर गूंज रहा था, भाई, पूरा का पूरा टेंशन है.
माइंड खराब हो गया था हुजूर
एक माननीय ने राहत की लंबी सांस खींचते हुए अपने साथी से कहा, दो दिन से पूरा माइंड खराब हो गया था. अब वोटिंग करके रिलैक्स महसूस कर रहे हैं. हमलोगों को तो ऐसा कर दिया गया था कि दीन-दुनिया से कोई मतलब ही नहीं रह गया था. माननीय का दर्द यहीं नहीं रुका. उन्होंने हंसते हुए अपनी वफादारी का भी इजहार कर दिया कहा हमलोग को क्या है? पार्टी जिसको बोलेगी, उसी को वोट दे देंगे. लेकिन इस चुनाव ने तो मॉरली डिस्टर्ब कर दिया था भाई.
शक की सुई और कैलस डायरेक्शन का खेल
तभी वहां दूसरे दल के एक और माननीय अवतरित हुए. उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ धोया और बोले, जो हाल आपकी तरफ था, वही हमारे तरफ भी था. हर समय शक की सुई एक-दूसरे पर ही घूम रही थी. ऊपर से ‘कैलस डायरेक्शन’ (लगातार मिलते कड़े निर्देश) पर डायरेक्शन दिए जा रहे थे. फोन तक पर पहरा था. अब जाकर जरा बदन हल्का हुआ है.अपनी ही पार्टी के साथी को देखकर ऐसे शक हो रहा था, जैसे सामने वाला विधायक नहीं, बल्कि सीआईडी का एजेंट हो.
अब घर-परिवार और क्षेत्र की याद आई
टेंशन का मीटर डाउन होते ही माननीयों को अचानक अपने बाल-बच्चे और क्षेत्र की जनता याद आ गई. एक विधायक जी ने कुर्ता झाड़ते हुए कहा, अब सीधे घर जाएंगे. घर-परिवार के साथ रहेंगे. बहुते टेंशन था. और हां, अब अपना क्षेत्र भी देखना है. क्षेत्र नहीं देखेंगे तो अगली बार चुनाव में कोई पूछेगा भी नहीं.
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