Ranchi: कोयला, बालू और पत्थर तस्करी के किस्से आपने खूब सुने होंगे,लेकिन अब एक ऐसा नेटवर्क सामने आ रहा है, जो न तो खुलेआम दिखता है और न ही उस पर उतनी सख्ती दिखती है. यह है प्रतिबंधित मांगुर मछली की तस्करी का संगठित खेल.
इस सिंडिकेट की जड़ें पश्चिम बंगाल से जुड़ी हैं. वहीं से बड़े पैमाने पर मांगुर मछली की सप्लाई तैयार होती है. इसके बाद झारखंड को ट्रांजिट कॉरिडोर की तरह इस्तेमाल किया जाता है.
मुख्य रूट कुछ इस तरह बताया जा रहा है:
बंगाल – धनबाद सीमा
गिरिडीह -हजारीबाग-बिहार
सूत्रों के मुताबिक, हर दिन 25 से 30 छोटे मालवाहक वाहनों के जरिए यह खेप राज्य की सीमाओं को पार करती है.
क्यों है यह मछली प्रतिबंधित?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह विदेशी प्रजाति (अफ्रीकन कैटफिश) पर्यावरण और स्थानीय जलीय जीवों के लिए खतरा मानी जाती है.इसी वजह से इसके पालन, बिक्री और परिवहन पर प्रतिबंध लगाया गया है.
करोड़ों का टर्नओवर, लेकिन कार्रवाई कम:
जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि इस अवैध कारोबार से हर महीने करोड़ों रुपये का लेन-देन हो रहा है. इसके बावजूद, बड़े स्तर पर कार्रवाई न के बराबर है.
स्थानीय स्तर पर जुड़े लोगों का कहना है कि जब्ती के बाद मछलियों के डिस्पोजल की प्रक्रिया जटिल होती है जिसमें कानूनी और प्रशासनिक झंझट शामिल हैं. ऐसे में कई बार कार्रवाई सीमित रह जाती है. हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है.
क्या प्रशासन बेखबर या बेअसर?
मत्स्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. छिटपुट छापेमारी की खबरें जरूर आती हैं, लेकिन इतने बड़े नेटवर्क को देखते हुए यह कार्रवाई नाकाफी मानी जा रही है. जमीनी स्तर पर यह भी देखने को मिला कि कई जगहों पर यह कारोबार खुलेआम चलता है, लेकिन समन्वित कार्रवाई की कमी साफ नजर आती है.
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सबसे बड़ा सवाल
- अगर रोजाना दर्जनों गाड़ियां राज्य की सीमाओं से गुजर रही हैं, तो क्या निगरानी तंत्र में कहीं न कहीं चूक है?
- या फिर यह नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका है कि उस तक पहुंचना आसान नहीं?
