दमन नहीं, संवाद की राह: जब सीएम हेमंत सोरेन की संवेदनशीलता ने बदल दी झारखंड की राजनीतिक और प्रशासनिक तस्वीर, एक फैसले ने जीता झारखंड के छात्रों का भरोसा

Saurav singh Ranchi: लोकतंत्र में जब सड़क पर छात्र उतरते हैं, तो अक्सर सत्ता की पहली प्रतिक्रिया लाठी, खौफ और दमन की...

The path of dialogue, not suppression: When CM Hemant Soren's sensitivity transformed the political and administrative landscape of Jharkhand—a single decision won the trust of the state's students.

Saurav singh

Ranchi: लोकतंत्र में जब सड़क पर छात्र उतरते हैं, तो अक्सर सत्ता की पहली प्रतिक्रिया लाठी, खौफ और दमन की होती है. इतिहास गवाह है कि युवा जब अपने भविष्य की खातिर सवाल पूछता है, तो शासन के गलियारों से अक्सर सन्नाटा या फिर पुलिस के पहरे परोस दिए जाते हैं. लेकिन झारखंड की राजधानी रांची में हाल ही में जो हुआ, उसने इस स्थापित और क्रूर राजनीतिक परंपरा को पूरी तरह से झुठला दिया. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जिस परिपक्वता, संयम और संवेदनशीलता का परिचय दिया, उसने यह साबित कर दिया कि झारखंड की सियासत में अब तानाशाही नहीं, बल्कि संवाद और जवाबदेही का एक नया दौर शुरू हो चुका है.

जब सड़क पर उतरा अनुशासन

रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पिछले 26 दिनों से एक ऐतिहासिक गवाही दे रहा था. एक तरफ जहां सिस्टम की लापरवाही से उपजा गुस्सा था, तो दूसरी तरफ अपने भविष्य को लेकर गहरी चिंता. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि इस आंदोलन में न तो अराजकता थी और न ही उग्रता. छात्रों ने संवैधानिक दायरे में रहकर शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से अपनी बात रखी. यह झारखंड के युवाओं की परिपक्वता ही थी कि उन्होंने अपनी जायज मांगों को लेकर सत्ता को कटघरे में तो खड़ा किया, लेकिन मर्यादा की लक्ष्मण रेखा कभी नहीं लांघी. छात्रों का यह अनुशासित संघर्ष देश के लिए लोकतंत्र की एक ऐसी खूबसूरत तस्वीर पेश कर रहा था, जहां व्यवस्था से असंतोष जताने के बावजूद संविधान का पूरा सम्मान किया जा रहा था.

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सीएम का संवेदनशील और असाधारण राजनीतिक रुख

किसी भी हुक्मरान के लिए यह आसान होता है कि वह लंबे समय तक चलने वाले आंदोलनों को बल के प्रयोग से कुचल दे या फिर उन्हें अनसुना कर दे. लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसके बिल्कुल उलट रास्ता चुना. उन्होंने छात्रों के गुस्से को उनकी वेदना समझा और एक अभिभावक की तरह इस पूरे प्रकरण की व्यक्तिगत तौर पर मॉनिटरिंग की. आंदोलन के शुरुआती दिनों में ही स्थिति की नजाकत को भांपते हुए एसडीओ और एडीएम को छात्रों से बातचीत के लिए भेजा गया. मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने 4 मंत्रियों की एक विशेष कमिटी का गठन किया, जिसने छात्र डेलिगेशन के साथ कई दौर की मैराथन बैठकें कीं. इसी सतत संवाद और दूसरे दौर की सार्थक बातचीत का नतीजा था कि सरकार ने 14वीं जेपीएससी पीटी परीक्षा को रद्द करने का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला ले लिया. सोमवार को बुलाई गई मंत्रियों की 4 घंटे लंबी आपात बैठक ने यह साबित कर दिया कि सरकार छात्रों की समस्याओं को लेकर कितनी गंभीर है. सीएम हेमंत सोरेन ने जेएसएससी समेत टीडीपीएल द्वारा आयोजित कराई गई तमाम संदिग्ध परीक्षाओं को रद्द करने का सीधा ऐलान कर दिया. यह फैसला इस बात की मुहर था कि सरकार युवाओं के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए पूरी तरह तैयार है.

2014 से अब तक की हर गड़बड़ी की होगी चीरफाड़

सरकार का यह फैसला केवल परीक्षाओं को रद्द करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे की जड़ तक जाने का संकल्प था. 14वीं जेपीएससी पीटी परीक्षा के परिणाम के बाद जैसे ही ओएमआर शीट के वायरल होने का सिलसिला शुरू हुआ, सरकार ने बिना एक पल गंवाए सीआइडीजांच के आदेश दे दिए थे. जांच के दायरे और सख्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस सिंडिकेट के तार कहां-कहां जुड़े थे.

गिरफ्तारियों का शिकंजा

मामले में जवाबदेही तय करते हुए जेपीएससी के तत्कालीन चेयरमैन एल ख्यांगते का इस्तीफा लिया गया. इसके साथ ही परीक्षा माफिया अभय कुमार तिवारी, जेपीएससी की उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता, टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह समेत 20 से अधिक लोग सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल मौजूदा मामले ही नहीं, बल्कि साल 2014 से अब तक ली गई सभी भर्ती परीक्षाओं की व्यापक जांच होगी. एसआइटी की जांच में कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं. सरकार ने साफ कर दिया है कि जांच को प्रभावित न करने के लिए भले ही अभी खुलासे रोके गए हों, लेकिन दोषी चाहे कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

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अमिताभ कौशल मॉडल पर भरोसा

भर्तियों को रद्द करना और दोषियों को जेल भेजना एक बड़ी राहत थी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि इन संस्थाओं (जेपीएससी और जेएसएससी) की साख को कैसे बचाया जाए और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को हमेशा के लिए कैसे रोका जाए. इस महती और बेहद संवेदनशील जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए सरकार ने झारखंड कैडर के 2001 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल पर भरोसा जताया है. वर्तमान में उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग के प्रधान सचिव और एमबीबीएस की पढ़ाई कर चुके अमिताभ कौशल अपनी बेदाग छवि, प्रशासनिक दक्षता और नियमों की बारीक समझ के लिए जाने जाते हैं. जब-जब राज्य सरकार के सामने कोई बड़ी प्रशासनिक या वित्तीय चुनौती आई है, संकटमोचन की भूमिका अमिताभ कौशल ने निभाई है. चाहे वह उत्पाद विभाग में टेंडर का जटिल खेल हो या फिर ट्रेजरी से करोड़ों की फर्जी निकासी जैसे मामलों की जांच—उनकी कार्यशैली पर कभी कोई सवालिया निशान नहीं लगा.

अब हमारी भी सुनी जाती है आवाज

16 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठने वाले आंदोलनकारी छात्रों की आंखों में अब राहत और जीत की चमक है. अनशनकारियों और युवाओं ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस फैसले का खुलकर स्वागत किया है. उनका कहना है कि झारखंड के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी सरकार ने अहंकार को त्यागकर छात्रों के दर्द को समझा और आदिवासियों-मूलवासियों के हितों की रक्षा के लिए इतना कठोर व ऐतिहासिक कदम उठाया. गिरफ्तारी और खुलासों के बीच, मुख्य आरोपी अभय तिवारी द्वारा दिए गए बयानों ने यह साबित कर दिया है कि सिस्टम के भीतर बैठे दीमक ने किस हद तक परीक्षाओं को खोखला कर रखा था. ऐसे में सरकार का यह कदम केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि प्रशासनिक शुद्धिकरण का महाअभियान बन चुका है.

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